नैनताल (जेएनएन): जाने माने शिकारी लखपत सिंह अब तक कुल 53 आदमखोर बड़ी बल्लियों का शिकार कर चुके हैं। वह मानव व वन्‍यजीवों के लगातार बढ़ रहे आपसी संघर्ष से चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि निरंतर खत्म हो रहे गुलदार पर्यावरण के खतरे की ओर साफ संकेत हैं। सरकार को उनके संरक्षण के लिए पहल करनी होगी।

लखपत ने बताया कि अब जंगल में गुलदार और बाघों के लिए खाना खत्म हो रहा है। जिस कारण वह भोजन की तलाश में शहरों का रुख कर रहे हैं। उत्‍तराखंड के सभी पहाड़ी जिलों का यही हाल हैं। जो भविष्‍य में गंभीर पर्यावरण के संकट को दर्शा रहा है। इसके लिए सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। सरकार को जंगलों को बचाने के लिए अभियान भी चलाने की जरूरत है।

दुख होता है आदमखोर गुलदारों को मारते हुए

लखपत ने बताया कि जब भी वे किसी आदमखोर गुलदार को मारते हैं तो उन्हें अच्छा नहीं लगता है। मजबूरी में वह यह काम करते हैं। आज जनदबाव में गुलदार मारे जा रहे हैं। यह गुलदार आदमखोर नहीं हैं। जहां भी एक बार हमला होता है तो जनसमुदाय उनको मारने के लिए सरकार पर दबाव बनाता है जिसके बाद वह उनको मारने के आदेश दे देती है। लोगों की गुलदार के प्रति नफरत भी ठीक नहीं हैं। हमें वन्य जीव जंतुओं से प्रेम की भावना जगानी पड़ेगी।

गुलदार को बचाने को पूरे बीस दिन का समय

गुलदार को आदमाखेर घोषित होने पर उसे बचाने के लिए पूरे बीस दिन का समय दिया जाता है। ट्रैंकूलाइज नहीं होने पर दस दिन के भीतर उसे मार गिरा दिया जाता है।

2002 से अब 53 गुलदार मारे

शिकारी लखपत सिंह उप शिक्षाधिकारी कार्यालय गैरसैंण में तैनात हैं। वह वन विभाग के लिए निशुल्क काम करते हैं। 2002 में आर्दबद्री गैरसैंण में 12 स्कूली बच्चों को मारने वाले आदमखोर का मार गिराया था।

यहां मारे तेंदुए

बागेश्वर-4, पिथौरागढ़-2, अल्मोड़ा-5, चमोली-13, टेहरी-13, पौढ़ी-6, उत्तरकाशी-2, रुद्रप्रयाग-3, चंपावत-2, नैनीताल-2।

गुलदार का शिकार होने से ऐसे बचे

शिकारी लखपत सिंह ने बताया कि शाम छह से आठ बजे के बीच बच्चों को घर से बाहर नहीं आने दें। खेतों में काम कर रही महिलाएं एक महिला की ड्यूटी पांच-पांच मिनट खड़े होने की लगाएं। सुबह-शाम गुलदार से सावधानी बरतनी जरूरी है।

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Posted By: Skand Shukla