जासं, नैनीताल : कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. सीपी बर्थवाल ने कहा है कि यूजीसी के स्थान पर उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम लागू करने से उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता प्रभावित होगी। सरकारों द्वारा अक्सर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी नीतियां थोपने का प्रयोग किया जाता रहा है। प्रस्तावित नए एक्ट में सरकार की भूमिका को बढ़ा दिया गया है। प्रस्तावित एक्ट के अधीन बनने वाले आयोग में सरकार नामित सदस्यों की संख्या अधिक होगी, जबकि उद्योगपति भी कमीशन का हिस्सा बन सकेंगे। स्वायत्तता के बजाय समानता पर बल दिया गया है।

प्रो. बर्थवाल शनिवार को यूजीसी ह्यूमैन रिसोर्स सेंटर में उच्च शिक्षा आयोग: मुद्दे, चुनौतियां और समाधान विषयक कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक आर्थिक अनुदान को प्रभावित करेगा। विशिष्ट अतिथि तीर्थाकर महावीर विवि के डीन प्रो. केके पांडे ने कहा कि वर्तमान समय में उच्च शिक्षा बदलाव के दौर से गुजर रही है। पिछले सालों में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। उन्होंने भी माना कि उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम के माध्यम से तय समानता हासिल करना कठिन होगा। निदेशक प्रो. बीएल साह ने कहा कि देश में एक शिक्षक पर सौ छात्रों का अनुपात है, जबकि विकसित देशों में एक शिक्षक पर 20-25 छात्र हैं। संचालन उपनिदेशक डॉ. दिव्या जोशी ने किया जबकि सहायक निदेशक डॉ. रितेश साह ने अतिथियों का स्वागत किया। साथ ही बताया कि कार्यशाला की सिफारिशें मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजी जाएंगी। इस अवसर पर डॉ. बीना पांडे, डॉ. कविता बिष्ट, डॉ. अजय कुमार, डॉ. अंजलि कमलेश पाटिल, डॉ. हिमांशु कांडपाल, इंदु मलिक समेत अन्य प्रदेशों के प्रतिभागी मौजूद थे।

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