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अंग्रेजों का नियम अब भी 'जिंदा', हल्द्वानी में पहाड़ों पर वसूला जाता है सिंचाई टैक्स और मैदानों में पानी मुफ्त

Published: Thu, 17 Sep 2026 09:15 PM (IST)

हल्द्वानी में ब्रिटिश काल का एक सिंचाई नियम अब भी लागू है, जिसके तहत पहाड़ी क्षेत्रों में पानी पर टैक्स लगता है जबकि मैदानी इलाकों में यह मुफ्त है।

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

HighLights

  1. हल्द्वानी में ब्रिटिश काल का सिंचाई नियम आज भी लागू है।

  2. पहाड़ी क्षेत्रों में सिंचाई पर टैक्स, मैदानी इलाकों में पानी मुफ्त।

  3. मार्च 2024 में चर्चा के बाद भी नियम नहीं बदला।

जागरण संवाददाता, हल्द्वानी। सुनने में बात अटपटी लगे लेकिन हकीकत यही है कि 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बावजूद सिंचाई विभाग में ब्रिटिश दौर का एक नियम अब भी 'जिंदा' है। जिसके तहत कहीं खेतों को सींचने के लिए बिना पैसों के पानी दिया जाता है तो किसी से टैक्स वसूला जाता है।

चौंकाने वाली बात यह है कि पर्वतीय क्षेत्र जहां छोटी जोत के काश्तकार होते हैं। उन गांवों को पूरी तरह टैक्स के दायरे में रखा गया है। जबकि मैदान के बड़े हिस्से को करमुक्त श्रेणी में डाला गया है। पूछने पर अफसर कहते हैं कि ब्रिटिश काल से ही यह नियम चला आ रहा है। यानी सिस्टम लकीर का फकीर बनकर रह गया है।

दूसरी तरफ मार्च 2024 में शासन स्तर पर मंथन के बाद दोहरे मापदंड को समाप्त करने पर मंथन तो किया गया लेकिन आदेश कागजों में नहीं उतर सका। शासनादेश के अभाव में नैनीताल जिले की 5585 हेक्टेयर भूमि अब भी करयुक्त दायरे से जुड़ी है।

सिंचाई विभाग की हल्द्वानी डिवीजन का रिकॉर्ड कहता है कि 14412 हेक्टेयर सिंचित भूमि क्षेत्र है। इसमें हल्द्वानी ब्लॉक की 60 और पर्वतीय ब्लॉक ओखलकांडा की 75 ग्राम पंचायतें आती है।

इसके अलावा धारी का आंशिक हिस्सा और भीमताल विकासखंड का डहरा व अमिया वाला भाग आता है। मैदानी भाग में काठगोदाम बैराज से सिंचाई नहरों और आगे गूलों के जरिये खेतों तक पानी की आपूर्ति होती है। जबकि पर्वतीय क्षेत्र में प्राकृतिक जलस्त्रोत, नदी, गधेरे और बरसात के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है।

विभाग के अनुसार ओखलकांडा, खनस्यू, भीमताल, धारी जैसे पर्वतीय क्षेत्र के साथ ही गौलापार-चोरगलिया और बसानी से जुड़े काश्तकारों से सिंचाई के ऐवज में टैक्स लिया जाता है। जबकि देवलचौड से बेलबाबा, लालकुआं, कठघरिया और लामाचौड़ के काश्तकारों को करमुक्त पानी मिलता है। मामले को लेकर अधिशासी अभियंता दिनेश सिंह रावत का कहना है कि ब्रिटिश दौर से चली आ रही व्यवस्था को शासनादेश मिलने के बाद ही समाप्त किया जाएगा।

कर वसूली का जिम्मा पटवारियों पर

कर सिस्टम को लेकर ईई का कहना है कि अगर किसी गांव की सिंचित भूमि का आंकड़ा जुटाने के बाद खेत नंबर का रिकार्ड चेक करते हैं। बिल बनाकर राजस्व विभाग को दिया जाता है। इसके बाद राजस्व उपनिरीक्षक (पटवारी) के माध्यम से वसूली कर विभाग तक पैैसे पहुंचते हैं। 40 रुपये प्रति हेक्टेयर के हिसाब से टैक्स लगाया जाता है।

50 साल पुराना रिकॉर्ड, अब बदल चुकी तस्वीर

सरकारी रिकॉर्ड की तुलना में अब कृषि भूमि की तस्वीर बदल चुकी है। विभाग कहता है कि 14412 हेक्टेयर हिस्सा सिंचित भूमि से जुड़ा है। लेकिन यह आंकड़े करीब 50 साल पुराने हैं। पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्र में लगातार हो रहे घरेलू-व्यवासायिक निर्माण के कारण खेती की जमीन घटती जा रही है।

विभाग के अनुसार 5585 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित भूमि से जुड़ा है। एक सीजन में 40 रुपये प्रति हेक्टेयर टैक्स के हिसाब से राजस्व 223400 होता है। इसके मुकाबले 27 से 28 हजार रुपये ही मिलते हैं। नए सिरे से सर्वे करने पर साफ हो जाएगा कि सिंचाई की जरूरत से जुड़ा क्षेत्र कितना घट चुका है।