क्या है पंडित गोविंद बल्लभ पंत की जयंती का सच? आज नहीं हुआ था जन्म, ये है सही तारीख
भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत की जयंती 10 सितंबर को मनाई जाती है, जबकि उनका वास्तविक जन्म इस दिन नहीं हुआ था।

पंडित पंत की जयंती आज: छात्र जीवन से ही आंदोलन में कूद पड़े थे पंत.

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
नरेश कुमार, नैनीताल। भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत की जयंती भले ही दस सितंबर को मनाई जाती हो, लेकिन उनका जन्म 30 अगस्त को हुआ था। इतिहासकार प्रो. अजय रावत का दावा है कि पंडित गोविंद बल्लभ पंत का जन्म 1887 में हिंदू पंचांग के अनुसार अनंत चतुर्दशी को हुआ था।
अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार उस वर्ष अनंत चतुर्दशी 30 अगस्त को पड़ी थी। 1955 में उनके गृहमंत्री बनने के दौरान हिंदू तिथिनुसार जन्म तारीख दस सितंबर निकली तो इसी दिन उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा चल पड़ी।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए व एलएलबी की पढ़ाई
प्रो. रावत बताते हैं कि प्रारंभिक शिक्षा के बाद पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने बीए व एलएलबी की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से की। 1905 दाखिला लेने के दौरान ही बंगाल विभाजन हुआ। तब उत्तर भारत में राजनीति का केंद्र बिंदु इलाहाबाद को माना जाता था।
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बंगाल विभाजन का पंत के जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने, गोपाल कृष्ण को गुरु मानने जैसी शुरुआती सक्रियता के बीच 1909 में उन्होंने विधि की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद पंत ने देश सेवा को चुनते हुए स्वतंत्रता आंदोलन की राह पकड़ ली।
राष्ट्रीय स्तर सेनानी व राजनेता का दर्जा किया प्राप्त
पंडित पंत 1914 में गठित प्रेम सभा, 1916 में गठित कुमाऊं परिषद के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे। 1926 के बाद उनके राजनीतिक कद का विस्तार होने लगा। वर्ष 1927 में उन्हें उत्तर प्रदेश पालीटिकल कांफ्रेंस का अध्यक्ष चुना गया, लेकिन 1928 में साइमन कमीशन के भारत आगमन पर विरोध जताने के बाद उनका सियासी कद राष्ट्रीय हो गया।
इस दौरान लखनऊ में विरोध की अध्यक्षता करने के दौरान लाठीचार्ज में वह चोटिल हो गए थे। इसके बाद वह देश के नामी स्वतंत्रता सेनानी अथवा राजनेताओं के रूप में जाने जाने लगे। यहीं से उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से देश के गृहमंत्री तक का सफर तय किया।
वन आंदोलन के जरिये प्रदेशवासियों को किया एकजुट
शुरुआती दौर में स्वतंत्रता आंदोलन से अलग-थलग पड़े कुमाऊं को पंत ने वन आंदोलनों के जरिये एकजुट करने का काम किया था। प्रो. रावत ने बताया कि वर्ष 1922 में उन्होंने वन नीतियों के विरोध में फारेस्ट प्राब्लम इन कुमाऊं पुस्तक लिखी। इस पर अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा दिया था।
