गौलापार जू सफारी: 10 साल में नाम बदला, बजट 80 से 270 करोड़ पहुंचा... मौके पर सिर्फ दीवार
गौलापार में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर, जिसे अब जू सफारी कहा जाता है, 10 साल बाद भी केवल एक चारदीवारी तक सीमित है।

जू सफारी के लिए चिह्नित 412 हेक्टेयर जमीन पर बनी है करीब 13 किमी लंबी चारदीवारी. Jagran

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
ललित मोहन बेलवाल, हल्द्वानी। आम आदमी को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया कोई प्रोजेक्ट इच्छाशक्ति की कमी, प्रशासनिक हीलाहवाली और लाल फीताशाही में फंसकर कैसे करदाता की जेब पर अप्रत्यक्ष रूप से बोझ डाल सकता है, इसका उत्कृष्ट उदाहरण है- नैनीताल जिले के गौलापार क्षेत्र में प्रस्तावित जू सफारी।
इस प्रोजेक्ट की घोषणा को 11 वर्ष से ज्यादा समय बीत चुका है, जबकि शिलान्यास को भी 10 वर्ष होने को हैं। इस अवधि में अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर का नाम बदला, निर्माण एजेंसी बदली और अनुमानित लागत 80 से 270 करोड़ रुपये पहुंच गई। जमीन पर सिर्फ चारदीवारी है, वो भी जगह-जगह से टूटी है।
2015 में अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर बनाने की घोषणा
कुमाऊं के प्रवेशद्वार हल्द्वानी के गौलापार में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मार्च 2015 में अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर बनाने की घोषणा की थी। इसके बाद अक्टूबर 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इसका शिलान्यास किया था। तब अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर के लिए 412 हेक्टेयर जमीन चिह्नित की गई थी, जबकि इसकी अनुमानित लागत 80 करोड़ रुपये आंकी गई थी। इसकी सुरक्षा के लिए यहां पर लगभग 14.52 करोड़ रुपये की लागत से करीब 13 किमी लंबी चारदीवारी भी बनाई गई।
चिड़ियाघर ने क्षेत्र के लोगों के लिए पर्यटन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार की नई उम्मीद जगाई। इसके बाद वर्ष 2017 में सरकार बदल गई और कछुवा गति से काम चलता रहा। वर्ष 2021 में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने आपत्ति लगाई कि वनभूमि विधिवत रूप से चिड़ियाघर के नाम हस्तांतरित नहीं हुई है इसलिए बिना अनुमति कोई भी गैर-वानिकी निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता है। हालांकि यहां पर अंदर एक कृत्रिम झील भी बनवाई गई।
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चूंकि यह वन्यजीवों की प्यास बुझाने के लिए भी थी इसलिए इसे गैर-वानिकी नहीं माना गया। इसके बाद वर्ष 2022 में मंत्रालय ने किसी भी कारिडोर के बाधित नहीं होने की शर्त रखते हुए चिड़ियाघर के काम को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी थी। साथ ही कहा था कि केंद्रीय जू प्राधिकरण की ओर से मास्टर प्लान स्वीकृत होने के बाद ही काम किया जा सकता है। वर्ष 2024 में प्राधिकरण से इसे मंजूरी मिली और नाम भी जू सफारी कर दिया गया।
निर्माण का जिम्मा पहले ब्रेथवेट, अब ब्रिडकुल को
वर्ष 2024 में ब्रेथेवट कंपनी को डीपीआर बनाने का जिम्मा दिया गया था। कंपनी ने शुरुआती रिपोर्ट बनाकर शासन को सौंपी थी, लेकिन डीपीआर बनाने के लिए जरूरी धनराशि नहीं मिलने के कारण फिर प्रोजेक्ट अटक गया था। इसके बाद मई 2026 में निर्माण एजेंसी बदल दी गई और ब्रिडकुल को जिम्मेदारी दी गई।
तीन गुना से ज्यादा पहुंची अनुमानित लागत
ब्रिडकुल ने उन्नत सैटेलाइट आधारित सर्वेक्षण तकनीक से जमीन का सर्वे करने के बाद जुलाई 2026 में वन विभाग को 270 करोड़ रुपये की प्राथमिक परियोजना रिपोर्ट (पीपीआर) सौंपी। इसका परीक्षण करने के बाद शासन को भेजा जाएगा। अब नई पीपीआर में अनुमानित लागत शुरुआती 80 करोड़ के मुकाबले तीन गुना से ज्यादा हो गई है।
पिछले महीने केंद्र की टीम ने किया निरीक्षण
अगस्त में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत इंदिरा गांधी नेशनल फारेस्ट अकादमी देहरादून के दो अधिकारियों ने जू सफारी का निरीक्षण किया। इसके साथ ही उन्होंने अब तक के निर्माण कार्यों की भी जांच की और अतिक्रमण का भी जायजा लिया। इधर, निर्माण एजेंसी ब्रिडकुल ने जू सफारी की मिट्टी के नमूने लेकर जांच के लिए आइआइटी रुड़की भेज दिए हैं।
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जू सफारी प्रोजेक्ट की विशेषता
- देश के पहले कार्बन न्यूट्रल जू के रूप में होगा विकसित
- ईंट, सरिया की जगह लकड़ी के इस्तेमाल को वरीयता
- रोशनी के लिए सौर ऊर्जा का होगा उपयोग
- अत्याधुनिक वाइल्डलाइफ वेटेरिनरी सुविधाएं मिलेंगी
- वन्यजीवों के लिए रेस्क्यू सेंटर बनाया जाएगा
- मोनोरेल और टाय ट्रेन चलाई जाएगी
जू सफारी प्रोजेक्ट का आकर्षण
- वाक-इन एक्वेरियम
- वाइल्डलाइफ सफारी (टाइगर, लेपर्ड, लायन, स्लाथ बियर, डीयर)
- अफ्रीकन सफारी
- आस्ट्रेलियन, यूरोपियन और अमेरिकन एनिमल जोन
- वाक-इन एवियरी (पक्षियों का बाड़ा)
- इको कैफैटेरिया
- जुरासिक थीम पार्क
- बायोडायवर्सिटी पार्क
- क्रोकोडाइल पूल
- बटरफ्लाई पार्क
- उत्तराखंड नालेज सेंटर
- प्राइमेट जोन
- बच्चों और जागिंग के लिए पार्क
जू सफारी प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। इसकी पीपीआर को संशोधित कराया जाएगा। अभी दो चरणों में में काम कराने का प्रस्ताव मिला है। इसे अधिक फेज में कराने पर विचार किया जाएगा। - दीपक सिंह, डीएफओ, तराई पूर्वी वन प्रभाग
