बागेश्वर, घनश्याम जोशी : हिमालय की गोद में कत्यूरों की राजधानी कार्तिकेयपुर में स्थित गागरीगोल गांव बसा हुआ है। इस गांव से आज तक पलायन नहीं हुआ है और यहां बाहर से भी लोग बस रहे हैं। नतीजा गांव की जनसंख्या लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण इस रास्ते होकर गागर में यहां गोलू देवता की मूर्ति ले जा रहे थे, तो इसी स्था पर उन्होंने विश्राम किया था। जिसके बाद इस स्थान का नाम गागर ग्वल और आगे चलकर में गागरीगोल हो गया।

 

पौराणिक कथाओं के अनुसार चंपावत से यहां स्व. पुरु पंत गागर यानि तांबे के पात्र में गोलू देवता को गढ़वाल की तरफ ले जा रहे थे और यहां उन्होंने विश्राम किया। तब इस स्थान का नाम गागर ग्वल्ल पड़ा और वर्तमान में वह गागरीगोल के नाम से जाना जाता है। सेवानिवृत्त शिक्षक मोहन चंद्र कंसेरी ने बताया कि जनश्रुति के अनुसार पौराणिक काल में यहां बड़ा तालाब था। ऐरावत हाथी के हरिद्वारछीना से जल निकासी के बाद वन और घास का मैदान था।

 

मटेना गांव के जोशी परिवार की एक दुधारू गाय यहां चुगने आती थी और शाम को घर लौट जाती थी, लेकिन वह दूध नहीं देती थी। जिज्ञासावस पशुपालक ने उसका एक दिन पीछा किया और गाय वर्तमान मंदिर के समीप खड़ी होकर जुगाली कर रही थी और उसके थनों से दूध निथर रहा था। उन्होंने मिट्टी हटाई और देखा की गागर में गोलू देवता का लिंग है और दूध सीधे गागर में गिर रहा है। उन्होंने उसी स्थान पर मंदिर बनाया और पूजा-अर्चना शुरू कर दी। गागर में ग्वल पैदा होने के कारण यहां का नाम गागर ग्वल और अब गागरीगोल है। यहां इंटर काॅलेज भी है जो स्व. पुरु पंत का थल के रूप में जाना जाता है।

 

गागरीगोल से होकर गोलू मंदिर पुरड़ा, डंगोली, ग्वाड़ होती हुए ग्वालदम, गढवाल तक पैदल मार्ग भी था लेकिन अब वह लुप्तप्राय हो गया है। मंदिर के पूजारी मटेना गांव के जोशी परिवार के लोग हैं और यहां बिखौती और महाशिवरात्रि पर्व पर मेले का आयोजन होता है। ग्रामीण फसल कटने के बाद गोलू देव मंदिर में नया अनाज चढ़ाते हैं और पशुओं का दूध भी चढ़ाया जाता है। दूध गोलू देवता को चढ़ने के बाद ही उसे पीने और अन्य प्रयोग में लाया जाता है। गांव के पूरन पाठक, महेश पाठक, शंकर रावत आदि ने कहा कि गांव से अभी तक पलायन नहीं हुआ है। करीब पांच किमी क्षेत्रफल में गांव फैला हुआ है। अन्य गांवों के लोग भी यहां पलायन कर आए हैं। गांव पूरी तरह आत्मनिर्भर है। यहां धान की फसल बेहतर होती है।

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