नरेश कुमार, नैनीताल : Dharamshalas of Jasuli Devi : भारत-तिब्बत संबंधों को दर्शाती ऐतिहासिक इमारतें फिर पुनर्जीवित हो रही हैं। 19वीं शताब्दी में कुमाऊं की दानी महिला जसुली देवी ने अपनी संपत्ति ब्रिटिश अधिकारी को देकर उसकी मदद से कई धर्मशालाओं का निर्माण करवाया था। जो आज भी उत्तराखंड के सबसे पुराने व्यापारिक संबंधों की याद ताजा कर रही हैं। जिला प्रशासन जिले में स्थित इन धर्मशालाओं को पुनर्जीवित करने में जुटा है।

कौन थीं जसुली देवी

  • इतिहासकार डा.अजय रावत बताते हैं कि उत्तराखंड की दारमा घाटी स्थित दांतू निवासी जसुली देवी जसवंत सिंह दुग्ताल की बेटी थी।
  • जसुली देवी के पति भारत-तिब्बत व्यापार से जुड़े होने के कारण समृद्ध परिवार से थे। पति और बेटे की मौत के बाद वह जीवन से निराश हो गई।
  • पति और बेटे के बाद उन्होंने अपनी सारी संपत्ति धौली नदी में फेंकने का मन बना लिया।
  • इसका पता जब तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी को लगा तो उन्होंने जसुली देवी को संपत्ति समाजसेवा में लगाने की सलाह दी।

इस बात को लेकर लोगों में भांंति

इतिहासकार डा.अजय रावत कहते हैं कि बहुत से लोग इस अंग्रेज अधिकारी के कुमाऊं कमिश्नर हेनरी रैमजे होने का दावा करते हैं, मगर यह सही तथ्य नहीं है। रैमजे का बतौर कमिश्नर 1856 से 1884 तक कार्यकाल रहा। जबकि धर्मशालाओं का निर्माण इस कालखंड के बाद करवाया गया।

जसुली देवी ने दात कर दी थी संपत्ति

अजय रावत कहते हैं कि जसुली देवी ने घोड़ों और बकरियों में लादकर चल संपत्ति अंग्रेज अधिकारी को दी थी। जिससे भारत-तिब्बत मार्ग में व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के लिए कई धर्मशालाओं का निर्माण करवाया गया। जिनमें से आज भी भवाली, सुयालबाड़ी और अल्मोड़ा जिले में कई धर्मशाला जर्जर हाल में मौजूद हैं।

धर्मशालाओं को पुनर्जीवित करने में जुटा जिला प्रशासन

जिला प्रशासन इन धर्मशालाओं को पुनर्जीवित करने की कवायद में जुटा है। डीएम धीराज गर्ब्याल ने बताया कि सुयालबाड़ी स्थित धर्मशाला का कार्य पूरा कर लिया गया है। इस स्थान पर अन्य सुविधाओं का विस्तार कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना है। वही भवाली की धर्मशाला का जीर्णोद्धार कार्य किया जा रहा है।

व्यापारियों की स्वतंत्रता आंदोलन में रही थी भूमिका

  • डा. अजय रावत बताते हैं कि भारत-तिब्बत के बीच घनिष्ठ व्यापारिक संबंध थे।
  • छठी शताब्दी से 1962 तक पिथौरागढ़ के सीमांत क्षेत्र निवासी भोटिया जनजाति के लोग तिब्बत से व्यापार करते थे।
  • भोटिया जनजाति के लोगाें की स्वतंत्रता आंदोलन में भी अहम भूमिका रही।
  • सीमांत क्षेत्र से व्यापारी दिल्ली, पंजाब, लाहौर तक व्यापार के लिए जाते थे।
  • व्यापारी स्वतंत्रता आंदोलन संबंधी कई सूचनाओं और समाचारों का वह आदान-प्रदान करते थे।
  • शौका व्यापारी बाबू राम सिंह व बद्रीदत्त पांडे को सूचनाएं देते थे।
  • व्यापारियों की सूचनाओं से सीमांत क्षेत्र तक स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगाने में मदद मिली थी।

रं समाज से ताल्लुक रखती थी जसुली देवी

डा. रावत बताते हैं कि जसुली देवी रं समाज से ताल्लुक रखती थीं। पिथौरागढ़ के दारमा, व्यास और चौंदास घाटी में निवासरत रं समाज अनूठी सांस्कृतिक धरोहर को संजोए है। साथ ही तिब्बत-भारत व्यापार भी बड़ा ऐतिहासिक पहलू है। जसुली देवी, रं समाज और भारत-तिब्बत व्यापार पर कोई विस्तृत और स्पष्ट शोध मौजूद नहीं है। जिस कारण इतिहास के कई पहलू आज भी अस्पष्ट हैं, इसमें शोध की आवश्यकता है।

च्यूरानी गांव के पास अनदेखी है धर्मशाला

डा. रावत ने बताया कि जसुली देवी की एक धर्मशाला पंगोट क्षेत्र से आगे च्यूरानी गांव के समीप स्थित है। तिगणेश्वर महादेव मंदिर के समीप स्थित धर्मशाला अद्भुत है। जिसकी छत पर चार से पांच बांज के पेड़ हैं, मगर भीतर से देखने पर पेड़ की जड़ और तना दिखाई नहीं देते।

1962 से पूर्व इस धर्मशाला में भारत-तिब्बत व्यापारी आया करते थे। 1962 में भारत-तिब्बत व्यापार बंद होने के बाद भी यहां व्यापारी अपने जानवर चुगाने पहुंचते थे। मंदिर के समीप होने के कारण यह धर्मशाला ग्रामीणों की देखरेख में हैख् मगर इसे संरक्षण की आवश्यकता है।

डीएम नैनीताल धीराज गर्ब्याल ने बताया कि सुयालबाड़ी में धर्मशाला का काम पूरा हो चुका है। जिसे संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाएगा। भवाली की धर्मशाला का कार्य भी चल रहा है। च्यूरानी में एक और धर्मशाला जानकारी में है। जल्द पर्यटन विभाग के अधिकारियों को भेज कर निरीक्षण करवाया जाएगा।

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Edited By: Skand Shukla

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