हल्द्वानी, अभिषेक राज : रेल मार्ग से भारतीय सीमा तक पहुंच के लिए चीन ने नेपाल के माध्यम से कदम आगे बढ़ा दिया है। कोरोना के बीच में ही चीनी दल ने तिब्बत के केरुंग से काठमांडू तक प्रस्तावित परियोजना का रविवार से सर्वे शुरू कर दिया। इसके तहत तय रूट में पडऩे वाली पहाड़ी, खाई, नदी, नाले और आबादी की रिपोर्ट तैयार की जाएगी। पहले चरण में फिलहाल टीम पहाड़ी की मजबूती और समतल क्षेत्रों की मिट्टी की जांच कर रही है। इस बीच भार क्षमता के साथ ही संबंधित रूट पर जलस्तर का भी पता लगाया जाएगा।

करीब 80 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग के निर्माण पर 257 अरब रुपये खर्च होने का अनुमान है। प्रस्तावित परियोजना के अनुसार काम 2027 में पूरा होना है। चीनी राष्ट्रपति ने 2018 में नेपाल दौरे के समय परियोजना पर हस्ताक्षर किया था, लेकिन दो साल तक मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। अब भारत से बढ़े तनाव और नेपाल में अतिक्रमण के आरोप में घिरे चीन ने इसपर तेजी दिखाते हुए सर्वे शुरू करा दिया है। भारत-नेपाल संबंधों के जानकार यशोदा श्रीवास्तव के अनुसार केरुंग-काठमांडू परियोजना के बाद चीन की तैयारी काठमांडू-पोखरा-लुंबिनी रेल मार्ग निर्माण की है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार इस परियोजना से चीन की पहुंच भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों तक हो जाएगी। यह सुरक्षा और आर्थिक दृष्टि से बेहतर नहीं होगा।

 

रिटायर्ड मेजर बीएस रौतेला ने बताया क‍ि नेपाल चीन की मदद से उत्तराखंड के चम्पावत जिले से लगती बनसा सीमा तक रेल परियोजना पर काम कर रहा है। इसके तहत गड्ढा चौकी तक रेल लाइन प्रस्तावित है। असल में चीन नेपाल को आगे कर सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक और आर्थिक रूप से खुद को मजबूत कर रहा है।

 

खास है काठमांडू-लुंबिनी परियोजना

सामरिक लिहाज से काठमांडू-लुंबिनी रेल परियोजना सबसे खास है। इसकी मदद से चीन नेपाल के मधेश से लगायत भारत के सीमावर्ती उत्तर प्रदेश, बिहार और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तराखंड तक पहुंच जाएगा। इस परियोजना की कुल लंबाई 152 किलोमीटर है। इसमें कुल 06 सुरंग, 16 पुल और 11 स्टेशन प्रस्तावित हैं।

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