जागरण संवाददाता, अल्मोड़ा: आजादी के आंदोलन में महिलाओं ने भी बढ़चढ़कर भाग लिया। लेकिन इतिहास में उनका जिक्र कम ही मिलता है। ऐसी ही आंदोलनकारी थीं बिश्ना देवी साह। वह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अल्मोड़ा से जेल जाने वाली पहली महिला बनीं। प्रधान डाकघर ने उनके सम्मान में विशेष आवरण जारी किया।

गुरुवार को आजादी के अमृत महोत्सव के तहत प्रधान डाकघर ने कार्यक्रम आयोजित किया। जिसमें ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लोहा लेेने वाली गुमनाम नायिका बिश्ना देवी साह के सम्मान में विशेष आवरण जारी किया। इस मौके पर उनके द्वारा किए गए कार्यों को याद किया गया। इस अवसर पर मदन ङ्क्षसह मटेला, शिवराज साह, डाक अधीक्षक बीएस भंडारी, पोस्टमास्टर चंद्रशेखर परगाई, बीपी डंगवाल आदि मौजूद थे। 

अंग्रेजों हुकूतम की हिलाई नींव

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बिश्ना देवी साह की भूमिका कभी नहीं भुलाई जा सकती है। स्वतंत्रता सेनानी बिश्ना देवी साह का जन्म 12 अक्टूबर 1902 में हुआ। उन्होंने कक्षा चार तक की पढ़ाई की। बहुत कम उम्र में ही उनके पति की मौत हो गई थी। पति के मरने के बाद अधिकतर महिलाएं माई बन जाती थी। बिश्नी देवी साह ने एकांकी जीवन यापन करने के बजाय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने का निश्चय किया। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका देख ब्रिटिश हुकूमत ने 1930 में उन्हें गिरफ्तार किया। 

अल्मोड़ा के कांग्रेस भवन में 23 जुलाई 1935 को उन्होंने तिरंगा फैलाया। तब कुमांऊ में जन जागरण के लिए पहुंची विजय लक्ष्मी पंडित ने भी बिश्नी देवी साह की स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका की प्रशंसा की। उन्होंने 26 फरवरी 1940 को अल्मोड़ा में एक बार फिर से झंडारोहण किया और 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी भाग लिया। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। बिश्नी देवी साह ने अल्मोड़ा में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के साथ निकाले गए विशाल जुलूस का नेतृत्व किया। 1974 में उनकी मृत्यु हुई।  

Edited By: Prashant Mishra