यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 20, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
भीम के द्वारा निर्मित बतायी जाती है भीमेश्वर झील, इसी से नाम पड़ा भीमताल
स्कंदपुराण के मानस खंड (जो कि लगभग एक हजार वर्ष पुराना है) में सबसे पहले भीमताल झील का वर्णन मिलता ...और पढ़ें

जागरण संवाददाता, भीमताल : भीमसरोवर झील को तृषिसरोवर भी कहा जाता है। स्कंदपुराण के मानस खंड (जो कि लगभग एक हजार वर्ष पुराना है) में सबसे पहले भीमताल झील का वर्णन मिलता है। मानस खंड के अनुसार सनतकुमार सरोवर,नल सरोवर, दमयंती सरोवर राम सरोवर, और सीता सरोवर के मध्य भीमताल है। मानस खंड की कहानी के अनुसार एक बार भीम हिमालय में अकेले ही आये थे। मार्ग में उन्हे रानीबाग के समीप चित्रशिला जो आज भी विद्यमान है और जिसमें विभिन्न चित्र बने हुए हैं उसके दर्शन हुए। चित्रशिला की पूजा अर्चना और वट की पददक्षिणां करने के बाद वे पहाड़ी पर चढऩा प्रारंभ हुए।
मानस खंड के मुताबिक अभी वे कुछ ही ऊंचाई पर हिमालय की ओर चढ़े थे कि आकाशवाणी हुयी और भीम को भगवान शंकर की अराधना करने को आकाशवाणी ने निदेशित किया। आकाशवाणी ने भीम को शंकर की आराधना के साथ साथ अंजलिदान कर शिवतत्व को प्राप्त करने को निदेशित किया। माना जाता है कि आकाशवाणी का अनुसरण करते हुए भीम ने अपनी गदा जमीन पर रखी और नैवेद्य वस्त्रादि से शिव की आराधना प्रारंभ की। गदा से गंगा का आहवान करते हुए एक गड्डा खोदा और गड्डे पर जल भर जाने पर जलांजलि शिव को दी। इससे वह जलाशय जलाचरों से भर गया। और बाद में मानवों के बसने पर इस स्थान का नाम भीमताल पड़ा है।
भीमेश्वर झील का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो लोग झील में स्नान करते हैं वह देव लोक में आनन्दित होते हैं। वहीं झील के किनारे शिव मंदिर का भी वर्णन है। उत्तर पश्चिम क्षेत्रीय गेजेटियर के संकलनकर्ता एटकिंसन ने 140 वर्ष पूर्व श्री भीमेश्वर महादेव के बारे में लिखा था। एटकिंसन के मुताबिक वर्तमान मंदिर को श्री बाजबहादुर चंद ने 17 वीं सदी में बनाया था। मंदिर पौराणिक स्थापत्य शैली जो कि पर्वतीय शैली की अपनी विशिष्टता है में बना है। उस काल के चित्र को देखने से लगता है मंदिर के शीर्ष पर चकोर काष्ठ छत्र था। इस प्रकार का स्थापत्य जागेश्वर बागेश्वर,गोपश्वर गुप्तकाशी और गौरी कुंड में ही नहीं श्री केदारनाथ के मंदिर में भी देखा जा सकता है। पुरातत्वविद के अनुसार मंदिर का स्थापत्य तीन सौ साल पुराना नहीं अपितु एक हजार वर्ष प्राचीन है। राजा बाजबहादुर ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार अवश्य करया था।
