गणेश पांडे, हल्द्वानी। Memories of Dilip Kumar : हिंदी सिनेमा के चमकने सितारे दिलीप कुमार का उत्तराखंड के लिए बड़ा योगदान रहा है। कुमाऊं की खूबसूरत वादियों में अदाकारी का जो सिलसिला दिलीप साहब ने शुरू किया, वह उनकी अभिनीत फिल्म मधुमती के गीत सुहाना सफर और ये मौसम हसीं की तरह आगे बढ़ता गया। 1958 में मधुमती सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई तो नैनीताल की वादियों को रुपहले पर्दे पर देखकर न केवल दर्शक, बल्कि फिल्मकार भी चकित रह गए। उस समय के टॉप के फिल्म निर्माता नैनीताल, घोड़ाखाल, रानीखेत की लोकेशन तलाशने लगे।

हिंदी सिनेमा से नैनीताल के जुड़ाव में फिल्म निर्देशक बिमल रॉय का अहम योगदान रहा। अक्सर नैनीताल घूमने आने वाले बिमल रॉय को यहां का सौंदर्य एक नजर में भा गया था। लेखक व फिल्म समीक्षक दीप भट्ट बताते हैं कि भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आइवीआरआइ) मुक्तेश्वर में रॉय के जीजा नौकरी करते थे। दीदी के परिवार से मिलने के सिलसिले में वह यहां आए। बाद में पूरी यूनिट लेकर मधुमती की शूटिंग में जुट गए। रामपुर नवाब की घोड़ाखाल स्थित हवेली में यूनिट के सदस्य ठहरते थे। मधुमती ने दिलीप साहब के करियर में चार चांद लगा दिए। फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट थी, लेकिन यहां की अनजानी लोकेशन फिल्मकारों की नजरों पर अमिट छाप छोडऩे में कामयाब रही।

दीप कहते हैं, तब शूटिंग के लिए नैनीताल आना आसान नहीं था, मगर रॉय व दिलीप साहब ने यहां के लिए राह तैयार की। बाद में बीआर चोपड़ा (फिल्म गुमराह 1963), नजर (शगुन 1964), यश चोपड़ा (वक्त 1965), कालीदास (भीगी रात 1965), राज खोसला (अनीता 1965), शक्ति सामंत (कटी पतंग 1983), शेखर कपूर (मासूम 1983) अनिल शर्मा (हुकुमत 1987), राकेश रोशन (कोई मिल गया 2003) में यहां आए। हाल के वर्षों में भी कई फिल्मों के कुछ अंश नैनीताल के आसपास फिल्माए गए हैं।

कुमाऊंनी पहनावे को मिली पहचान

दिलीप कुमार व वैजयंती माला अभिनीत फिल्म मधुमती ने कुमाऊंनी संस्कृति, विशेषरूप से महिलाओं के पारंपरिक पहनावे, जेबर आदि को हिंदी सिनेमा के फलक तक पहुंचाया। मधुमती में वैजयंती गले में चांदी की हंसुली, पांव में चांदी के धागुले व वस्त्रों में घाघरा व आंगड़ी पहने नजर आईं। कहा जाता है कि अल्मोड़ा के प्रसिद्ध रंगकर्मी स्व. मोहन उप्रेती ने फिल्म निर्देशक रॉय को अभिनेत्री के इस पहनावे के लिए राजी कराया था।

हल्द्वानी के होटल में भी हुई थी शूटिंग

मधुमती की शूटिंग केमू स्टेशन के पास स्थित कैलाश व्यू होटल में भी हुई थी। स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती की किताब स्मृतियों के झरोखे से के मुताबिक, तब हल्द्वानी में सुविधाओं युक्त होटल एक-दो ही थे। मधुमती की टीम ने कुछ दिन कैलाश व्यू होटल में बिताए। उस समय हल्द्वानी की आज की तरह बसासत नहीं थी। यहां से छोटा कैलास पर्वत दिखाई देने के नाम पर होटल का नाम रखा गया था।

Edited By: Prashant Mishra