हल्द्वानी, जेएनएन : नगर निगम की दुकानों को मनमाने तरीके से बेचने के मामले में शासन स्तर से जांच शुरू होने के बााद कर्मचारियों के बीच हड़कंप की स्थिति है। दुकानें बेचने के कारनामे को अंजाम देने वाली कार्यकारिणी समिति में शाामिल पार्षद भी सकते में आ गए हैं। गुरुवार को कुछ पार्षदों ने इस मामले में नगर आयुक्त से मुलाकात की। शासन स्तर से जांच शुरू होने के बाद निगम कर्मचारियों और पार्षदों को कार्रवाई व वसूली का डर सताने लगा है।

शहर में नगर निगम की 1183 दुकानें हैं। इसके लिए निगम तय दरों के आधार पर किराया वसूलता है। किराया नियमावली के तरह किरायेदार निगम की संपत्ति को दूसरे के नाम नहीं बेच सकता। मगर सांठगांठ और तरकीब लड़ाकर पिछले कुछ वर्षों में करीब 155 दुकानों को दूसरों को बेच दिया गया है। नियम विरूद्ध दुकानें बेचने में स्टांप शुल्क में भी चोरी की बात सामने आई है। शिकायत के बाद शासन ने मामले का संज्ञान लेते हुए आईजी निबंधन सुधांशु त्रिपाठी को जांच सौंपी है।

 

दैनिक जागरण ने गुरुवार के अंक में 40 लाख रुपये से अधिक की स्टांप शुल्क चोरी होने की संभावना जताते हुए खबर प्रकाशित की थी। खबर प्रकाशित होने के बाद मार्केटिंग अनुभाग से जुड़े कार्मिकों व कार्यकारिणी समिति में शामिल पार्षदों में खलबली मच गई है।

 

नगर आयुक्त सीएस मर्तोलिया से मुलाकात करने पहुंचे पार्षद राजेंद्र जीना, मो. गुफरान ने कहा कि भवन नामांतरण के काले कारनामे में उन्हें मोहरा बनाकर प्रयोग किया गया है। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच कराने व निगम की संपत्ति की बर्बादी रोकने की मांग की। इस दौरान इंदिरानगर जन विकास समिति के संरक्षक तौफीक अहमद भी शामिल रहे।

 

सीएस मर्तोलिया, नगर आयुक्त ने बताया कि निगम की दुकानों का नामांतरण नहीं किया जा सकता। मामले में शासन स्तर से जांच चल रही है। जांच रिपोर्ट के आधार पर शासन से मिलने वाले आदेशानुसार कार्रवाई होगी।

 

दस गुना जुर्माने का प्रावधान

स्टांप शुल्क चोरी के मामले में दस गुना जुर्माने का प्रावधान है। शहर के विभिन्न इलाकों के सर्किट रेट के आधार पर नगर निगम की 155 दुकानों पर पांच फीसद स्टांप व दो फीसद रजिस्ट्रेशन शुल्क मिलाकर यह रकम 40 लाख से अधिक बैठती है। स्टांप शुल्क चोरी के प्रावधान के मुताबिक इस राशि का दस गुना यानी चार करोड़ रुपये पेनाल्टी चुकानी होगी। इस राशि को सुनकर कार्मिकों व पार्षदों में हड़कप की स्थिति बनी हुई है।

 

ऐसे होता है नामांतरण का खेल

निगम की दुकानों को बेचने के लिए शातिर तरीके से रास्ता तैयार किया गया है। इसे नाम दिया है पार्टनरशिप। दुकान का किराएदार शपथपत्र देकर घोषणा करता हैं कि वह अपनी बीमारी, अस्वस्थता की वजह से दुकान को चलाने में असमर्थ है। जिसे दुकान बेची जानी हो, इसे लंबे समय से पार्टनर होनो बताया जाता है। धीरे-धीरे दुकान में अपना शेयर कम और दूसरे का अधिक दिखाकर दुकान उसके नाम करने का शपथपथ दिया जाता है। जिसके आधार पर किराएदारी बेच दी जाती है। जबकि किसी की संपत्ति को कोई किराएदार दूसरे के नाम नहीं बेच सकता। इस सबके पीछे लाखों की डील होती है।

 

एसएनए को कराया अधीकृत

कार्यकारिणी समिति में नगर आयुक्त की भूमिका अहम होती है। निगम सूत्रों के मुताबिक 2016 में चालाकी के साथ कार्यकारिणी समिति के मामलों के निस्तारण के लिए प्रभारी सहायक नगर आयुक्त विजेंद्र चैहान को अधीकृत कर दिया गया। समिति अनमाने तरीके से मामलों को निपटाते रही। फाइल को नगर आयुक्त की टेबल तक जाने का रास्ता ही बंद कर दिया गया।

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Posted By: Skand Shukla

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