नैनीताल, जेएनएन : हाई कोर्ट ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल अधिनियम 1985 के अंतर्गत केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की तरह उत्तराखंड में भी ट्रिब्यूनल बनाने के सरकार को आदेश दिए हैं। साथ ही मुख्य सचिव को इस मामले में चार माह में एक्शन टेकन रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने महाराष्ट्र के राजनेता एआर अंतुले के केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए महाधिवक्ता के इस तर्क को स्वीकार किया कि पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल को नियमों की वैधानिकता देखने का अधिकार नहीं है।कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कृष्णा सहाय व राजेन्द्र यादव से संदर्भ में पारित आदेश के आधार पर सरकार को मामले में कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है।

दरअसल वन विभाग के श्यामलाल व अन्य ने याचिका दायर कर उत्तराखंड अधीनस्थ वन सेवा नियमावली के प्रावधानों को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने नियमावली 2016 के रूल्स 5(3), 8, संशोधित नियमावली 2018 के रूल्स 5(3), 8(2), 10 व 15 को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त करने की मांग की। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि मामले में ट्रिब्यूनल क्यों नहीं गए।

अदालत ने महाधिवक्ता एसएन बाबुलकर से कोर्ट के मामले में सहायता का अनुरोध किया। महाधिवक्ता का तर्क था कि ट्रिब्यूनल को रूल्स की वैधानिकता तय करने का अधिकार नहीं दिया गया है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि प्रशासनिक ट्रिब्यूनल जो 1985 में बना है, उसके तहत प्रशासनिक ट्रिब्यूनल को दी गई शक्तियों में रूल्स की वैधानिकता देख सकता है। जबकि राज्य ट्रिब्यूनल को यह अधिकार नहीं दिया गया है।

न्यायालय को अधिकार देना विधायिका का कार्य है। बुधवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति रमेश चन्द्र खुल्बे की खंडपीठ ने बुधवार को मामले में फैसला देते हुए तमाम निर्णयों का हवाला दिया। खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकारा कि पब्लिक सेवा ट्रिब्यूनल को रूल्स की वैधानिकता तय करने का अधिकार नहीं है।

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Posted By: Skand Shukla

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