बाजपुर, जयपाल सिंह यादव : गलवन वैली में चीन की चालबाजी से 20 वीर सपूत शहीद हो गए। इससे पूरा देश गुस्सा में है। गम और गुस्से के इस माहौल में पूर्व सैनिकों का भी खून चीन से मोर्चा के लिए खौल रहा है। खासकर वे जो गलवन में तैनाती के दौरान भारत मां की रक्षा में डटे रहे। बाजपुर के बरहैनी व हरिपुरा क्षेत्र के पूर्व सैनिकों ने दैनिक जागरण से बातचीत में गलवन व सियाचीन घाटी के हालात और अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि मोर्चे पर दुश्मन के साथ ही मौसम से भी संघर्ष करना होता है।

 

विपरीत हालात में भी जवान देश की सेवा में मुस्तैदी से डटे रहते हैं। गलवन घाटी से ठीक ऊपर सियाचिन ग्लेशियर में तैनाती थी। विपरीत परिस्थितियों में काम कैसे करना होता है यह हमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता। दुश्मन से देश की सुरक्षा के साथ-साथ मौसम से भी संघर्ष करना पड़ता है। 19-कुमाऊं इंडियन आर्मी की ऐसी पहली रेजिमेंट है जिसकी बटालियन 1984 में श्रीनगर से करीब 450 किमी पैदल चलकर ग्लेशियर पर पहुंची। इस बटालियन में मैं भी शामिल था। लेफ्टिनेंट केएस पुंडीर समेत अपने 20 साथियों को खोया। सभी मौसम से जूझते हुए शहीद हो गए। करीब दो साल मैं सियाचिन में ही तैनात रहा। वर्तमान समय में सैन्य ताकत के मामले में देश ने काफी तरक्की की है। आज हम प्रत्येक स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं। -राजेंद्र गिरि, रिटायर्ड कैप्टन-कुमाऊं रेजिमेंट

 

महेश जोशी, रिटायर्ड कैप्टन-कुमाऊं रेजिमेंट ने बताया कि करीब आठ माह पहले रिटायर्ड हुआ। 2013-14 में करीब दो साल गलवन घाटी में तैनात रहा। सर्दी के दिनों में अधिक बर्फबारी होने से लेह से लेकर गलवन तक पैदल मार्ग भी बंद व अदृश्य हो जाते हैं। इससे एलएसी पर पेट्रो¨लग करना मुश्किल होता है। गलवन घाटी में एलएसी पर पक्का निर्माण नहीं है। मैप के सहारे पेट्रो¨लग करने गई सैनिकों की टुकड़ी कई बार थोड़ा बहुत नियंत्रण रेखा के इधर-उधर हो जाती है, लेकिन वहां रुकती नहीं। चीन सैनिकों की ओर से भी ऐसा ही किया जाता है। मौजूदा हालात में कहा जा सकता है कि जोर-जबरदस्ती करके हमारी भूमि को कोई कब्जा करने की सोचेगा तो उसका माकूल जवाब देश के वीर सैनिक देंगे।

 

मोहन सिंह, रिटायर्ड सूबेदार-कुमाऊं रेजिमेंट ने बताया कि सेना में सेवा देकर 1985 में रिटायर्ड हुआ। 1954 में कुमाऊं रेजिमेंट में चौखुटिया रानीखेत में भर्ती हुआ। बाद में लखनऊ भेज दिया गया। 1962 में चीन से युद्ध हुआ तो हमारी बटालियन को सिक्किम मोर्चे पर भेजा गया। हम जब तक सीमा पर पहुंचे जब तक युद्ध विराम हो चुका था। इसके बाद देश के आखिरी गांवों छांगो झील, तेरह मील स्टोन, 17 मील स्टोन की सुरक्षा में तीन साल तक तैनात रहे। सर्दी के दिनों में भोजन तो दूर पानी भी बर्फ पिघलाकर पीना पड़ता था। धीरे-धीरे स्थिति काफी सामान्य हो गई थी और दोनों देशों के सैनिक (भारत-चीन) नियंत्रण रेखा पर एक-दूसरे से हाथ भी मिला लिया करते थे। आज भारत पहले के मुकाबले काफी मजबूत है। चीन इसे समझ भी रहा है।  

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