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पिथौरागढ़, जेएनएन : मालपा में हुए हादसे को 21 वर्ष पूरे हो गए हैं। इस हादसे में कैलास मानसरोवर यात्रियों सहित 205 लोगों की असमय मौत हो गई थी। पिछले 21 वर्षों में मालपा दो बार उजड़ा और फिर बस गया। 

17 अगस्त 1998 की रात कैलास मानसरोवर यात्रियों का 12वां दल कैलास दर्शन को जा रहा था। तब मालपा कैलास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था। छोटे-छोटे कई ढाबे रात भर चलते रहते थे और चहल पहल रहती थी। 12वें दल में  प्रख्यात नृत्यांगना प्रोतिमा बेदी (सिने कलाकार कबीर बेदी की पत्नी और पूजा बेदी की मां) भी शामिल थी। भोजन के बाद भगवान शिव पर आधारित उनके नृत्य का कार्यक्रम तय हुआ था। इसे देखने के लिए दल में शामिल सभी 60 कैलास मानवरोवर यात्रियों के साथ ही स्थानीय लोग, सीमा सड़क संगठन के कर्मचारी मौजूद थे। रात्रि 12 बजे नृत्य के दौरान ही जिस चोटी की जड़ पर मालपा बसा था वह ढह गई। पूरा पड़ाव भारी मलबे में दफन हो गया। इस हादसे में दल के साथ जा रहे चिकित्सक डॉ. विनोद गड़कोटी सुरक्षित बच गए। वह नृत्य कार्यक्रम में शामिल नहीं थे, बल्कि कुछ दूरी पर लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह में ठहरे हुए थे। उन्हीं के जरिए इस हादसे की खबर मिली। पैदल मार्ग ध्वस्त हो गया इसलिए वहां पहुंचना संभव नहीं था। एअरफोर्स की मदद से खोज अभियान चलाया गया। सेना, आइटीबीपी स्थानीय लोगों की मदद से एक माह तक चले राहत-बचाव अभियान में कुछ शव बरामद हुए और अधिकांश का कुछ पता नहीं लग सका। इस हादसा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा। देश और दुनिया भर के मीडिया कर्मी इसकी कवरेज के लिए धारचूला तक पहुंचे। इस हादसे के बाद मालपा पड़ाव को खत्म कर दिया गया। यात्रियों को गाला पड़ाव से सीधे बूंदी ले जाया जाने लगा। कई वर्षो तक मालपा वीरान रहा। लेकिन स्थानीय लोगों की जद्दोजहद से इस पड़ाव फिर रौनक लौट आई। होटल खुल गए। आवागमन करने वाले लोग यहां रात बिताने लगे। लेकिन वर्ष 2013 में फिर इस पड़ाव ने बड़ी आपदा झेली। भूस्खलन से दर्जनों स्थानीय लोग फिर हादसे का शिकार हो गए। मालपा फिर उजड़ गया। स्थानीय लोगों ने हिम्मत नहीं हारी। 2015 में मालपा एक बार फिर आबाद हो गया। स्थानीय लोगों का मानना है उनका जीवन चुनौतियां भरा है पर वे प्राकृतिक घटनाओं से हार मानने वाले नहीं हैं। मालपा को कभी उजडऩे नहीं दिया जाएगा। उनकी आने वाली पीढिय़ां इसे हमेशा आबाद रखेंगी। 

तेज आवाज के साथ भरभराकर टूट पड़ाी थी पहाड़ी

कैलास मानसरोवर यात्रा हर वर्ष जून में शुरू होती है। पैदल यात्रा के दौरान बारिश के कारण भूस्खलन का खतरा बना रहता है। 1998 तक इस यात्रा का पड़ाव पिथौरागढ़ जनपद का मालपा क्षेत्र भी होता था। जुलाई 1998 में यात्रियों का तीसरा जत्था, जिनकी संख्या 60 थी, मालपा में कुमाऊं मंडल विकास निगम के पर्यटन गृह और आसपास के घरों में रुका था। इस दल के साथ वहां करीब दर्जन भर से अधिक खच्चर स्थानीय दुकानदार और पोर्टर सहित दो सौ से अधिक लोग रुके थे। अ‌र्द्धरात्रि को भयानक आवाज के साथ विशाल पहाड़ी भरभरा कर मालपा के ऊपर गिर गई। भूस्खलन इतना भयानक था कि वहां ठहरे लोग पहाड़ी के नीचे दफन हो गए। लगभग दो महीने तक यहां आपदा कार्य चला। भूस्खलन की वजह से शारदा नदी की तेज धारा में बह गई कुछ ही लाशें मिल पाई। वर्ष 1998 के बाद मालपा पड़ाव में रात्रि विश्राम बंद कर दिया गया।

 

एक साल पहले प्रोतिमा ने खोया था बेटे को  

 

महज 49 साल की उम्र में प्रख्‍यात फिल्‍म अभिनेता कबीर बेदी की पत्‍नी और पूजा बेदी की मां प्रोतिमा बेदी भी इस हादसे का शिकार हुई थीं। उन्‍होंने एक साल पहले ही अपने बेटे सिद्धार्थ को खो दिया था। उसने अमेरिका में पढ़ाई के दौरान खुदकुशी कर ली थी। प्रोतिमा बेदी, दिल्ली में पैदा हुई थीं और तीन बेटियों तथा एक बेटे के साथ चार बच्चों के परिवार में दूसरी बेटी थीं। जिला प्रशासन ने स्थानीय गोताखोरों और कुलियों की मदद से प्रोतिमा की तलाश की। 

 

Posted By: Skand Shukla

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