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उत्तराखंड के चर्चित IFS संजीव चतुर्वेदी के मामले की सुनवाई से जज ने खुद को किया अलग, रिकॉर्ड 17 जजों ने छोड़ा केस

Published: Sat, 26 Sep 2026 02:43 PM (IST)Updated: Sat, 26 Sep 2026 02:49 PM (IST)

आईएफएस संजीव चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई से 17वें न्यायाधीश ने भी खुद को अलग कर लिया है, जो देश के न्यायिक इतिहास में एक रिकॉर्ड है।

उत्तराखंड कैडर के चर्चित आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी।

उत्तराखंड कैडर के चर्चित आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी।

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जागरण संवाददाता, नैनीताल। उत्तराखंड कैडर के चर्चित आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के मामलों की सुनवाई से न्यायाधीशों के स्वयं को अलग करने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब 17वें न्यायाधीश ने उनके मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया है।

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की दिल्ली पीठ के न्यायमूर्ति राजवीर सिंह वर्मा ने भी उस याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया है, जिसमें मई 2025 के सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के परिपेक्ष्य में, आईएफएस अधिकारियों के मूल्यांकन रिपोर्ट चैनल के संबंध में उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के आदेश को चुनौती दी गई है।

सुनवाई से अलग होने का कोई विशिष्ट कारण नहीं बताया

पूर्व के आदेशों की तरह, इस आदेश में भी सुनवाई से अलग होने का कोई विशिष्ट कारण नहीं बताया गया है, जो इसे और भी असामान्य बनाता है।

यह देश के न्यायिक इतिहास में एक रिकॉर्ड है, क्योंकि इससे पहले कभी भी इतने अधिक न्यायाधीशों ने किसी एक व्यक्ति के मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग नहीं किया है। अब तक सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायाधीश, नैनीताल उच्च न्यायालय के चार न्यायाधीश, अध्यक्ष सहित कैट के नौ न्यायाधीश तथा जिला न्यायपालिका के दो न्यायाधीश, उनके मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग कर चुके हैं।

इससे पूर्व, सितंबर-अक्टूबर 2025 में, नैनीताल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आलोक वर्मा और न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी ने भी चतुर्वेदी के मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था। यह मामला उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा पारित स्थगन आदेश की जानबूझकर अवहेलना किए जाने को लेकर चतुर्वेदी द्वारा कैट के सदस्यों और रजिस्ट्री के विरुद्ध दायर अवमानना याचिका से संबंधित था।

स्वयं को मामले से अलग किया

दिल्ली कैट की न्यायमूर्ति राजवीर सिंह वर्मा की पीठ द्वारा 21 सितंबर को पारित इस नवीनतम आदेश में कहा गया है, 'कुछ समय तक मामले की सुनवाई करने के पश्चात, राजवीर सिंह वर्मा, सदस्य (न्यायिक), स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग करते हैं।'

फरवरी 2024 में, नैनीताल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनोज तिवारी ने चतुर्वेदी के उस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था, जो उनकी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के संबंध में मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (एसीसी) से दस्तावेज़ तलब करने से संबंधित था।

मई 2023 में, नैनीताल उच्च न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने चतुर्वेदी के उस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था, जो उनके मूल्यांकन रिपोर्ट मामले में, एम्स के मुख्य सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) के रूप में उनके द्वारा की गई भ्रष्टाचार-विरोधी जाँच के दस्तावेज़ तलब करने से संबंधित था।

नैनीताल उच्च न्यायालय के इन चारों न्यायाधीशों में से किसी ने भी सुनवाई से अलग होने के अपने आदेशों में कोई कारण नहीं बताया।

अप्रैल 2025 में, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) नेहा कुशवाहा ने कैट के एक अन्य न्यायाधीश डी.एस. महरा के साथ अपने पूर्व पारिवारिक संबंधों का हवाला देते हुए, चतुर्वेदी द्वारा कैट न्यायाधीश मनीष गर्ग के विरुद्ध दायर मानहानि मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।

फरवरी 2025 में, हरविंदर ओबेरॉय और बी. आनंद की सदस्यता वाली कैट की खंडपीठ ने बिना कोई कारण बताए, केवल रजिस्ट्री को यह निर्देश देकर स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया था कि भविष्य में चतुर्वेदी के मामले उनके समक्ष सूचीबद्ध न किए जाएं। यह पीठ उस मामले की सुनवाई कर रही थी,

जो एम्स, दिल्ली में मुख्य सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) के पद पर रहते हुए चतुर्वेदी की मूल्यांकन रिपोर्ट को तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा द्वारा डाउनग्रेड किए जाने (ग्रेड घटाए जाने) से संबंधित है।

नवंबर 2013 में, सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने संजीव चतुर्वेदी द्वारा दायर उस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था, जिसमें उनके द्वारा उजागर किए गए विभिन्न भ्रष्टाचार के मामलों तथा उनके उत्पीड़न में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और राज्य के अन्य वरिष्ठ राजनेताओं एवं नौकरशाहों की भूमिका की सीबीआई जाँच की माँग की गई थी।

बाद में, अगस्त 2016 में, सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश यूयू ललित ने भी इस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।

अप्रैल 2018 में, शिमला की एक अदालत के न्यायाधीश ने हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव विनीत चौधरी द्वारा संजीव चतुर्वेदी के विरुद्ध दायर मानहानि मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया था।