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पहचान खुलने के डर और खाली जेब ने बढ़ाया सुरेंद्र कोली का डिप्रेशन, डायरी में कुछ लोगों के लिए लिखा धन्यवाद

Published: Fri, 18 Sep 2026 08:15 PM (IST)

2006 Noida Nithari Case सुरेंद्र कोली हरिद्वार में अपनी पहचान छिपाकर और आर्थिक तंगी से जूझ रहा था, जिससे उसका ...और पढ़ें

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शैलेंद्र गोदियाल, जागरण हरिद्वार। अतीत की पहचान सामने आने का डर और जेब भी खाली..., दोनों चुनौतियों के बीच सुरेंद्र कोली हरिद्वार में करीब एक माह से अपनी पहचान छिपाकर जिंदगी गुजार रहा था।

लोगों के बीच वह सदाराम, निवासी अल्मोड़ा था, जबकि उसके सामान में रखा आधार कार्ड उसकी मुख्य पहचान थी। संभव है कि निठारी कांड में आरोपित रहने के बाद सुरेंद्र कोली को सामाजिक बहिष्कार और लोगों के व्यवहार बदलने का डर था। हालांकि, पुलिस को उसके सामान में मिली डायरी में उसने कुछ लोगों के लिए धन्यवाद भी लिखा था।

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Surendra Koli Suicide, Nithari Case इसी आशंका को लेकर वह जगह-जगह पहचान छिपाता रहा। आर्थिक तंगी ने सुरेंद्र कोली की मुश्किलें और बढ़ा दी थीं। आर्थिक तंगी की तस्दीक उसकी लेनदेन की डायरी से भी होती है।

सुरेंद्र कोली के सामान की फोरेंसिक जांच के दौरान पुलिस को आधार कार्ड, फोटो पहचान पत्र, मोबाइल फोन, लेनदेन का हिसाब लिखी डायरी, कपड़े और अन्य सामान मिले हैं।

आधार कार्ड में नाम सुरेंद्र कोली पुत्र शंकर राम कोली और पता सेक्टर-31, नोएडा, गौतमबुद्धनगर, उत्तर प्रदेश दर्ज है। वहीं, वोटर आइडी में नाम सदाराम पुत्र शंकर राम और पता अल्मोड़ा दर्ज है।

यह वोटर आइडी वर्ष 2003 की बताई जा रही है। हरिद्वार सहित अन्य स्थानों में उसने इसी पुराने परिचय को अपनी पहचान बना रखा था।
पहचान छिपाने की यह कोशिश सुरेंद्र कोली के हरिद्वार में रहने और रोजगार तलाशने के दौरान भी दिखाई दी।

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हरिद्वार रोशनाबाद में कमरा किराये पर लेते समय मकान मालिक ने आधार कार्ड मांगा तो सुरेंद्र कोली ने बताया कि आधार गांव में है और जल्द मंगवा देगा। चार दिन बाद तक आधार कार्ड नहीं देने पर मकान मालिक ने कमरा खाली करा दिया।

पहचान से जुड़े दस्तावेज और बैंकिंग संबंधी जानकारी सामने न रखने के कारण सिडकुल हरिद्वार की कंपनियों में भी रोजगार हासिल करना भी मुश्किल रहा।

रोशनाबाद निवासी धर्मेंद्र कौशिक के अनुसार, सुरेंद्र करीब 20 दिन से उनके संपर्क में था और उसे सदाराम नाम से ही जानता था। वह सिडकुल की एक सुरक्षा गार्ड कंपनी में काम कर रहा था, लेकिन नौकरी छोड़कर दूसरा काम करना चाहता था।

धर्मेंद्र ने उसकी मदद करते हुए सप्तऋषि मार्ग के पास चाय की दुकान दिलाने में सहयोग किया और खुद गारंटर भी बने। गुरुवार को उन्होंने उसे दो हजार रुपये भी दिए थे। उनके मुताबिक, सुरेंद्र आर्थिक रूप से परेशान था, लेकिन उसका व्यवहार बेहद अच्छा था।

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रोशनाबाद में कमरा व सुरक्षा गार्ड कंपनी में कुछ दिन के लिए रोजागर दिलाने वाले विशाल कश्यप ने भी उसे सदाराम और अल्मोड़ा निवासी के रूप में ही जाना।

लेकिन, मकान मालिक को आधार कार्ड उपलब्ध नहीं करा पाने के कारण उस ठिकाने पर भी सुरेंद्र कोली ज्यादा दिन नहीं टिक सका। छह सितंबर को सुरेंद्र ने सप्तऋषि मार्ग पर चाय की दुकान शुरू की। दुकान खोलने से पहले पूजा कराई और आसपास प्रसाद बांटा।

फिर कुछ दिन दुकान बंद रही और तीन-चार दिन पहले दोबारा खोली। आसपास के किसी व्यक्ति को उसके अतीत की जानकारी नहीं थी। अब पुलिस को मिले उसके सामान में एक डायरी भी मिली। जिसमें उसने कुछ लोगों के नाम लिखे हैं और उसमें लिखा है गरीब की मदद करने के लिए धन्यवाद। 

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