अनूप कुमार, हरिद्वार

महाभारत कालीन पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के भीमगोड़ा कुंड के दिन जल्द बहुरने वाले हैं। इसके कायाकल्प की कवायद शुरू हो गई है। कुंभ मेला अधिष्ठान ने इसकी मरम्मत और सुधार के लिए शासन को 30 लाख का प्रस्ताव भेजा है। 'दैनिक जागरण' ने अपने सात-सारोकार अभियान के तहत इसकी साफ-सफाई कर जीर्णोंद्धार के लिए मुहिम चलाई हुई थी । कुंभ मेलाधिकारी दीपक रावत ने सिचाई विभाग को कुंभ मेला-2021 के बजट से इसके कायाकल्प करने के आदेश दिए थे। इसी के तहत यह प्रस्ताव भेजा गया है। कुंभ मेलाधिकारी दीपक रावत ने दावा किया है कि कुंड को दिसंबर के अंत तक चालू कर इसे नया स्वरूप प्रदान कर दिया जाएगा।

ऐतिहासिक महत्व का महाभारत कालीन भीमगोडा कुंड देखरेख के अभाव में दयनीय अवस्था में पहुंच गया था। इसे गंगा नदी से गंगाजल पहुंचाने वाली सरकारी नहर पर अतिक्रमण-अवैध कब्जा कर होटल, धर्मशाला, आश्रमों और घरों का निर्माण करा लिया गया है। यहां तक कि नदी जल में सिल्ट आने पर नहर व कुंड में इसे रोकने को बनाए गए सेफ्टी वाल्व की चाभी और फाटक तक अतिक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिए थे। इस कारण नहर में भीमगोड़ा कुंड तक गंगाजल का प्रवाह रुक गया था और कुंड में गंगाजल की बजाय गंदा बरसाती और नाले का बदबूदार पानी भर जाता है, जिसमें मछलियां पनप गई हैं, जिसकी वजह से श्रद्धालु यहां आने से कतराने लगे थे। महाभारतकालीन भीमगोड़ा कुंड के ऐतिहासिक-पौराणिक महत्व और इसकी दयनीय अवस्था की जानकारी होने पर कुंभ मेलाधिकारी दीपक रावत ने 29 अगस्त 2019 को एसएसपी कुंभ जनमेजय खंडूरी के साथ कुंड और उसे अबाध गंगाजल पहुंचाने वाले अंग्रेजों के जमाने की 100 वर्ष से भी अधिक पुरानी नहर का स्थलीय निरीक्षण किया था। उन्होंने नहर पर हुए कब्जों और कुंड को गंगाजल न पहुंचने पर गहरी नाराजगी जताते हुए सिचाई विभाग के अधिकारियों को योजनाबद्ध तरीके से इसकी व्यवस्था कराने को निर्देश दिए थे। इसके बाद कुंड को गंगाजल पहुंचाने वाली नहर की सफाई और मरम्मत का काम शुरु किया गया था। कुंड में गंगाजल के आने और जाने के पुख्ता इंतजाम किए जाएंगे, जिससे कुंड का पानी लगातार बदलता रहे, क्योंकि रुके हुए पानी में सड़ांध होने की आशंका रहती है। यह सब होने के बाद कुंड की लाइटिग और सौंदर्यीकरण का काम किया जाएगा।

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भीमगोड़ा कुंड का महत्व

हरिद्वार: भीमगोड़ा कुंड के बारे में मान्यता है कि महाभारत युद्ध के बाद जब पांचों पांडव द्रौपदी सहित स्वर्गारोहण पर जा रहे थे तो वह कुछ देर को यहां विश्राम के लिए रुके थे। उस वक्त द्रोपदी को प्यास लगने और आसपास पानी न होने पर महाबली भीम ने अपने पैर (गोड़) से धरती पर प्रहार किया था, जिससे वहां जल का सोता फूट आया था और द्रोपदी ने अपनी प्यास बुझाई थी। कालांतर में इस स्थान को भीमगोड़ा कुंड के नाम से जाना जाने लगा था। मान्यता के अनुसार यहीं से पांडव ने अपनी प्रसिद्ध स्वर्गारोहण यात्रा भी शुरू की थी। यह यात्रा पथ इसके पास से ही गुजरता है। बाद में अंग्रेज सरकार ने इसके पौराणिक, धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के चलते 1842 से 1854 के बीच भीमगोड़ा कुंड को विस्तार देकर इसमें गंगाजल भरने को छोटी नहर का निर्माण कराया था।

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मेला अधिष्ठान ने इसके लिए शासन को 30 लाख की योजना भेजी है। स्वीकृति मिलते ही काम में तेजी ला दी जाएगी। कुंड का सौंदर्यीकरण करा इसे बेहतरीन रूप में ला दिया जाएगा।'

दीपक रावत, कुंभ मेलाधिकारी

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