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एसआईआर: गुरु परंपरा से हरिद्वार के संतों के सामने 'पहचान' का संकट, मिलने लगे हैं नोटिस

Published: Thu, 03 Sep 2026 03:04 PM (IST)

हरिद्वार के साधु-संतों को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में मतदाता सूची से नाम हटने का संकट झेलना पड़ रहा है, ...और पढ़ें

इस तस्वीर का उपयोग सांकेतिक रूप में किया गया है।

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गौरव त्यागी, हरिद्वार । विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में साधु-संतों की सनातन परंपरा और निर्वाचन व्यवस्था के तय प्रारूप के बीच पहचान का संकट उभर आया है। साधु-संतों की सामान्य गृहस्थ मतदाताओं से अलग जीवन-पद्धति एसआईआर में उनके पुराने पारिवारिक और मतदाता रिकार्ड से मिलान को मुश्किल बना रही है।

संन्यास के बाद सांसारिक माता-पिता की जगह अपने दीक्षा गुरु को ही पिता या अभिभावक मानने वाले कई संत मतदाता सूची के सत्यापन में विसंगति की श्रेणी में आ रहे हैं। बड़ी संख्या में नोटिस मिल रहे हैं। ऐसे में उनके सामने मतदाता सूची से नाम हटने का संकट आ गया है।

धर्मनगरी में अखाड़ों, आश्रमों, मठों और मंदिरों में रहने वाले साधु-संतों की संख्या करीब 20 हजार है। इनमें ज्यादातर संत किशोरावस्था या युवावस्था में घर-परिवार छोड़कर संन्यास ग्रहण कर चुके हैं। दीक्षा के बाद उनकी सामाजिक और धार्मिक पहचान गुरु परंपरा से ही होती है।

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साधु-संतों की संख्या करीब 20 हजार

साधु समाज में गुरु को ही मार्गदर्शक, संरक्षक और कई मामलों में पिता तुल्य माना जाता है, इसलिए मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड, आधार, बैंक खाते अथवा आश्रम से जुड़े अभिलेखों में भी कई संतों ने पिता के स्थान पर गुरु का नाम दर्ज कराया है।

अब एसआईआर के दौरान माता-पिता के नाम, जन्मस्थान, पुराने निवास और पारिवारिक विवरण पूछे जाने पर ऐसे संतों के सामने व्यावहारिक कठिनाई खड़ी हो जाती है, जिन्होंने संन्यास के बाद वर्षों से अपने गृहस्थ जीवन से कोई संपर्क नहीं रखा है।

कई संतों के अनुसार, उनके पास उपलब्ध पहचान संबंधी दस्तावेजों में गुरु का ही नाम लगातार दर्ज है, इसलिए अचानक जैविक पिता या माता का विवरण मांगने पर रिकार्ड का मिलान नहीं हो पा रहा है।

संतों ने पिछले दिनों एक राष्ट्र-एक चुनाव मुद्दे पर हुए संत समागम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के समक्ष भी यह मुद्दा उठाया था। हालांकि जिला प्रशासन का कहना है कि साधु-संतों के बारे में अखाड़े लिखकर दे देंगे तो इस समस्या के निवारण के प्रयास किए जाएंगे।

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मांगे जा रहे दो से तीन दस्तावेज

  • 18 से 21 वर्ष के साधु-संतों के पास तीन दस्तावेज जमा करने का नोटिस आया है। पहला अपना पहचान पत्र, दूसरा पिता और तीसरा माता का 2003 में बना मतदाता पहचान पत्र।
  • 22 से 39 वर्ष के साधुओं से पहचान पत्र और पिता का 2003 में बना मतदाता पहचान पत्र
  • 40 वर्ष से अधिक उम्र के साधुओं से भी पहचान पत्र और पिता का 2003 में बना मतदाता पहचान पत्र

इस संबंध में सभी जिलाधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं। ऐसे प्रकरणों में 2003 के दस्तावेज देखकर इन्हें निस्तारित करने को कहा गया है। -बीवीआरसी पुरुषोत्तम, मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तराखंड

पारिवारिक रिकार्ड से न किया जाए मिलान

पंचायती बड़ा अखाड़ा उदासीन के महंत राघवेंद्र दास का कहना है कि अखाड़ा परंपरा में दीक्षा के बाद शिष्य की नई धार्मिक पहचान बनती है। कई संतों के पुराने मतदाता पहचान पत्रों और अन्य सरकारी दस्तावेजों में वर्षों से यही विवरण चला आ रहा है। ऐसे में केवल नाम के प्रारूप या पारिवारिक कालम के आधार पर उनके मताधिकार पर प्रश्न खड़ा होना उचित नहीं होगा।