जागरण संवाददाता, रुड़की: इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर लगभग 119 सालों के बाद गुरुवार एवं स्वाति नक्षत्र का अद्भुत संयोग बन रहा है। यह योग बहुत ही मंगलकारी रहेगा। वहीं, 13 सितंबर को मूर्ति स्थापना के लिए सुबह ग्यारह से लेकर दोपहर दो बजकर 50 मिनट तक शुभ मुहूर्त रहेगा।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश के जन्म उत्सव के रूप में मनाया जाता है। आइआइटी रुड़की परिसर स्थित श्री सरस्वती मंदिर के आचार्य राकेश कुमार शुक्ल के अनुसार, गणेश उत्सव मनाने की परंपरा लगभग सवा सौ वर्ष पुरानी है। इस चतुर्थी को गणेश चतुर्थी, विनायक चतुर्थी, कलंक चतुर्थी और पत्थर चौथ भी कहा जाता है। इस दिन चंद्रमा का दर्शन करना निषेध माना गया है। ऐसा करने से मिथ्या कलंक (आरोप) लगता है। उन्होंने बताया कि चतुर्थी से लेकर चौदश (दस दिन) तक भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करके पूजन किया जाता है। वहीं, चौदश के दिन मूर्ति की विसर्जन किया जाता है। उनके अनुसार, गणेश चतुर्थी के दिन घर में मूर्ति लाकर विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करके प्रतिदिन षोडशोपचार पूजन, आरती करके उन्हें दुर्वा, मोदक, खील, कुमकुम जैसी विभिन्न वस्तुएं अर्पण करने से सभी प्रकार के विघ्न दूर हो जाते हैं। भगवान गणेश की मूर्ति का अभिषेक करने से चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति होती है।

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