देहरादून, जेएनएन। लॉकडाउन में बेजुबान और बेसहारा जानवरों पर आफत टूटी है। सड़कों और गलियों में घूमने वाले इन जानवरों की कोई सुध लेने वाला नहीं है। कोरोना के खौफ से लोग जानवरों को खाना देने तक से बच रहे हैं। ऐसे में दून के कुछ बच्चों ने बेसहारा जानवरों का सहारा बन मिसाल पेश की है। खास बात यह है कि इन बच्चों ने अपनी गुल्लक की कमाई से कुत्तों और दूसरे जानवरों को खाना खिलाना शुरू किया है। छोटी उम्र में स्कूल पढ़ रहे बच्चों की यह पहल सराहनीय है।

कैनाल रोड स्थित इंदर बाबा मार्ग पर रहने वाले रवि कुमार और माही थापा लॉकडाउन में कैनाल रोड पर रहने वाले आवारा कुत्तों और दूसरे पशुओं को खाना खिला रहे हैं। रवि जीआइसी किशनपुर में दसवीं और निशा नौवीं कक्षा में पढ़ते हैं। रवि के पिता राजेश कुमार कैनाल रोड पर ही एक कोठी में खाना बनाते हैं। वहीं, निशा के पिता मनोज थापा प्लंबर हैं। परिवार की माली हालत ठीक नहीं होने के बाद भी इन दोनों बच्चों ने जानवरों का दर्द समझ कर अपने गुल्लक में जोड़े गए पैसो से इनके लिए दूध और बिस्किट खरीदना शुरू किया। 

रवि बताते हैं कि एक दिन एक कार मालिक ने कार से कुछ ब्रेड सड़क पर पड़े कुत्तों के सामने फेंक दिए और फोटो खिंचा कर चल दिए। बाद में उन्होंने देखा कि कुत्तों ने तो ब्रेड खाए ही नहीं। उसी दिन से बेसहारा कुत्तों को रोज खाना खिलाने का विचार उनके मन में आया। पास में रहने वाली निशा थापा समेत दूसरे दोस्तों से इस बारे में बात की तो निशा ने भी हामी भर दी। अगले ही दिन से कुत्तों को खाना खिलाना शुरू कर दिया।

जानवरों को खाना खिलाना और उनकी देखभाल करना, अब उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया है। बताया कि जब गुल्लक के पैसे खत्म हो गए तो घरवालों और घर के आसपास के कुछ लोगों से मदद ली। इन बच्चों ने गर्मी शुरू होने के साथ ही अपने घर के आस-पास पक्षियों के लिए पानी रखना भी शुरू कर दिया है। रवि कुमार और निशा ने बताया कि कुछ दिन पहले से वन विभाग की रेस्क्यू टीम के कुछ लोगों ने भी उनकी मदद करना शुरू किया है।

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वन विभाग मुख्यालय की रेस्क्यू टीम भी कर रही मदद

वन विभाग मुख्यालय की रेस्क्यू टीम के लीडर रवि जोशी ने बताया कि एक दिन गस्त के समय रवि कुमार और निशा को कैनाल रोड पर कुत्तों  को खाना खिलाते हुए देखा था। जब उनसे पूछा तो पता चला दोनों अभी स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं और अपने दम पर इन कुत्तों को पिछले कई दिनों से खाना खिला रहे हैं। छोटी उम्र में उनके इस बड़े प्रयास ने मुङो बहुत प्रभावित किया। मेरी रेस्क्यू टीम के साथियों ने हर महीने इन बच्चों को सहायता के तौर पर एक हजार रुपये देना तय किया है। जिससे यह बच्चे लगातार बेजुबानों की सहायता कर सकें।

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Posted By: Raksha Panthari

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