राज्य ब्यूरो, देहरादून। Year Ender 2021 देवभूमि उत्तराखंड में बीता साल राजनीतिक उतार-चढ़ाव के लिए तो याद रखा ही जाएगा, धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में भी इसकी चर्चा होगी। विषय जुड़ा है चारधाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री के साथ ही इनसे जुड़े मंदिरों समेत कुल 51 मंदिरों की व्यवस्था के लिए लाए गए उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम और इसके अंतर्गत गठित देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड से। विडंबना देखिये कि दो साल पहले प्रदेश की भाजपा सरकार में त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में इस अधिनियम को लाया गया और इस साल के आखिर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने इसे निरस्त कराकर चारधाम में पूर्व व्यवस्था को बहाल कर दिया। चारधाम के तीर्थ पुरोहितों व हक-हकूकधारियों के विरोध और विपक्ष द्वारा इस विषय को तूल दिए जाने के बाद सरकार ने मामले का भले ही पटाक्षेप कर दिया, लेकिन जब भी मंदिरों की व्यवस्था को लेकर बात होगी तो इस अधिनियम का उल्लेख जरूर होगा।

दरअसल, देश के चारधामों में एक बदरीनाथ और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ की व्यवस्था के लिए वर्ष 1939 में बना बदरीनाथ-केदारनाथ अधिनियम लागू था। इस अधिनियम के अंतर्गत गठित बदरी-केदार मंदिर समिति दोनों धामों की व्यवस्था देखती आ रही थी। गंगोत्री और यमुनोत्री धामों की मंदिर समितियां अलग -अलग अस्तित्व में हैं और वे अपने-अपने मंदिरों की व्यवस्थाएं देखती हैं। इस बीच चार धामों बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री में श्रद्धालुओं के साथ ही पर्यटकों की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ेगी, ऐसे में धामों में इसी के हिसाब से व्यवस्थाएं जुटाया जाना आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए त्रिवेंद्र सरकार ने चारधाम सहित 51 मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लाने का निर्णय लिया।

चारधाम श्राइन बोर्ड से देवस्थानम तक

त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्रित्वकाल में 27 नवंबर 2019 को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में उत्तराखंड चारधाम श्राइन बोर्ड विधेयक को मंजूरी दी गई थी। तब इसके दायरे में बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री और इनसे जुड़े मंदिरों समेत कुल 51 मंदिर लाए गए। दिसंबर 2019 में हुए विधानसभा सत्र में सरकार ने यह विधेयक पेश किया। 10 दिसंबर 2019 को सदन में यह विधेयक नाम बदलकर उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन विधेयक के रूप में पारित हुआ। 13 जनवरी 2020 को राजभवन की मंजूरी मिलने के साथ ही यह विधेयक अधिनियम बन गया। 25 फरवरी 2020 को शासन ने इस अधिनियम के तहत देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड के गठन की अधिसूचना जारी की। बोर्ड के अस्तित्व में आने पर उसने बदरीनाथ व केदारनाथ की व्यवस्थाएं अपने हाथ में लीं। साथ ही दोनों धामों की व्यवस्था संभालने वाली बदरी-केदार मंदिर समिति बोर्ड में समाहित कर दी गई।

भाजपा के भीतर नहीं थी एक राय

यह सही है कि देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम को भाजपा की त्रिवेंद्र सरकार लेकर आई, लेकिन पार्टी के भीतर इसे लेकर एक राय नहीं थी। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी मंदिरों के सरकारीकरण के पक्ष में नहीं था। ऐसे में माना गया कि देवस्थानम के संबंध में गहन चिंतन-मनन नहीं हुआ। हालांकि, तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र का कहना था कि सभी से राय लेने के बाद ही यह अधिनियम लाया गया। अधिनियम की मंशा तीर्थ पुरोहितों और हक-हकूकधारियों के हितों को सुरक्षित रहते हुए व्यवस्थाएं बेहतर करना है।

लगातार विरोध करते रहे तीर्थ पुरोहित

चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम और इसके अंतर्गत चारधाम समेत 51 मंदिरों की व्यवस्था के लिए गठित चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड का चारधाम के तीर्थ पुरोहित और हक-हकूकधारी शुरुआत से ही विरोध करते रहे। उनका कहना था कि यह अधिनियम और बोर्ड तीर्थ पुरोहितों व हक-हकूकधारियों के हितों पर कुठाराघात है। तीर्थ पुरोहित सरकार के इस निर्णय के विरुद्ध लगातार आंदोलित रहे। मामला उच्च न्यायालय में भी गया। अदालत ने चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम व बोर्ड को संवैधानिक करार दिया।

नेतृत्व परिवर्तन के बाद तेज हुई हलचल

मार्च 2021 में भाजपा सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के बाद देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को लेकर तब हलचल तेज हुई, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने बोर्ड को निरस्त करने के संकेत दिए कि जनता जैसा चाहेगी, उसी के अनुरूप निर्णय लिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने तब चारधाम के तीर्थ पुरोहितों से वार्ता की बात भी कही थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। जुलाई में सरकार में फिर नेतृत्व परिवर्तन हुआ और पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

मुख्यमंत्री धामी ने दिखाया दम

देवस्थानम बोर्ड को लेकर चारधाम के तीर्थ पुरोहितों और हक-हकूकधारियों के बीच से उठ रहे विरोध सुरों को थामने के मद्देनजर मुख्यमंत्री धामी ने जुलाई में ही इस मामले के समाधान को हाई पावर कमेटी के गठन की घोषणा की। फिर पंडा-पुरोहित समाज के बीच से आने वाले राज्यसभा के पूर्व सदस्य मनोहरकांत ध्यानी की अध्यक्षता में यह कमेटी गठित की गई। इस बीच दीपावली के अगले दिन पांच नवंबर को प्रधानमंत्री के केदारनाथ आगमन का कार्यक्रम तय हुआ तो तीर्थ पुरोहितों ने केदारनाथ में डेरा जमाया। तीर्थ पुरोहितों ने प्रधानमंत्री के आगमन से दो दिन पहले केदारनाथ पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का विरोध किया और उन्हें मंदिर में नहीं जाने दिया।

इसके बाद मुख्यमंत्री धामी और उनकी कैबिनेट के सदस्यों सुबोध उनियाल, डा हरक सिंह रावत ने केदारनाथ जाकर तीर्थ पुरोहितों को मनाने में कामयाबी पाई। तब तीर्थ पुरोहितों को आश्वासन दिया गया कि 30 नवंबर तक इस मामले में निर्णय ले लिया जाएगा। साथ ही उनकी प्रधानमंत्री से वार्ता का भरोसा भी दिलाया गया। नतीजतन, पांच नवंबर को तीर्थ पुरोहितों के प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री को केदारनाथ में ज्ञापन सौंपकर देवस्थानम बोर्ड को निरस्त करने का आग्रह किया। इस बीच नवंबर में हाई पावर कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी और मुख्यमंत्री ने इसके अध्ययन के लिए मंत्रिमंडलीय उपसमिति गठित की। फिर उपसमिति की रिपोर्ट मिलने के बाद मुख्यमंत्री धामी ने 30 नवंबर को देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को भंग करने और इससे संबंधित अधिनियम को वापस लेने की घोषणा कर दी।

दिसंबर में बहाल हुई पुरानी व्यवस्था

धामी सरकार ने अपने वायदे के अनुसार उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन निरसन विधेयक विधानसभा के शीतकालीन सत्र में 10 दिसंबर को सदन में पेश किया। अगले दिन सदन से इस विधेयक को पारित कराकर चारधाम की पूर्व व्यवस्था से संबंधित अधिनियम को पुनर्जीवित करने पर मुहर लगाई। इसके बाद राजभवन से मंजूरी मिलने के बाद देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम निरस्त हुआ और चारधाम के लिए पूर्व व्यवस्था बहाल हो गई।

विपक्ष के हाथ से छिना मुद्दा

देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को लेकर विपक्ष भी सरकार के विरुद्ध हमलावर तेवर अपनाए हुए था। साथ ही विपक्ष कांग्रेस की ओर से यह आश्वासन दिया जा रहा था कि उसके सत्ता में आने पर इससे संबंधित अधिनियम को वापस लिया जाएगा, लेकिन धामी सरकार ने इस अधिनियम को वापस लेकर विपक्ष के हाथ से यह मुद्दा छीन लिया। साथ ही यह संदेश देने का प्रयास किया कि सरकार के लिए जनभावनाएं सर्वोपरि हैं।

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Edited By: Sunil Negi