जागरण संवाददाता, देहरादून: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) में पीएफ में अनियमितता पकड़ी है। ईपीएफओ की जांच में पता चला कि संस्थान कर्मचारियों का पीएम जमा करने में मनमर्जी कर रहा है और यह अनियमितता वर्ष 1989 से चली आ रही है। अब अधिकारियों ने पीएफ देनदारी की धनराशि का आकलन शुरू कर दिया है। इसके लिए संस्थान से संबंधित कर्मचारियों के सेवा संबंधी रिकॉर्ड तलब किए गए हैं।

ईपीएफओ के देहरादून स्थित क्षेत्रीय कार्यालय को लंबे समय से शिकायत मिल रही थी कि संस्थान ने जिन कर्मचारियों को विभागीय संविदा पर रखा है, उन्हें पीएफ का लाभ नहीं दिया जा रहा। इसके बाद संगठन के सहायक आयुक्त पंकज कुमार को मामले की जांच सौंपी गई थी। सहायक आयुक्त की हालिया जांच रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि पीएफ का यह मामला भारतीय वन्यजीव संस्थान के करीब 65 कर्मचारियों से जुड़ा है। संस्थान को पीएफ अधिनियम 1952 के अनुरूप पीएफ कटौती करनी चाहिए थी, जबकि संस्थान आजादी से पहले के पीएफ अधिनियम 1925 को मान रहा है। इसके अनुरूप भी संस्थान ने वर्ष 2002 से कार्रवाई शुरू की है, जबकि संस्थान पर यह देनदारी वर्ष 1989 से बन रही है। जांच में यह भी पता चला कि संस्थान जिन कर्मचारियों का पीएफ काट भी रहा है, उसमें भी मानकों का ख्याल नहीं रखा जा रहा। किसी कर्मचारी की पीएफ कटौती दो फीसद तो किसी की चार फीसद की दर से की जा रही है। नियमानुसार यह कटौती 12 फीसद होनी चाहिए। जिस तरह से वर्ष 1989 से डब्ल्यूआइआइ पर पीएफ की देनदारी बन रही है, उसे देखते हुए यह अनियमितता करोड़ों रुपये की बैठती है। हालांकि, इसके स्पष्ट आकलन के लिए ईपीएफओ ने संस्थान से कर्मचारियों के सेवा संबंधी विभिन्न रिकॉर्ड तलब किए हैं। इस काम में तीन से चार माह का और समय लगने की संभावना है। हम पीएफ की कटौती नियमों के अनुरूप ही कर रहे हैं। सभी तरह के कानून का पालन किया जा रहा है। अभी ईपीएफओ की रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है। रिपोर्ट मिलने के बाद उसका जवाब दिया जाएगा। जरूरत पड़ी तो संस्थान मामले में अपील भी करेगा।

डॉ. वीबी माथुर, निदेशक (भारतीय वन्यजीव संस्थान)

Posted By: Jagran

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