गैंडा सींग तस्करी पर लगाम: डीएनए तकनीक से खुलेगा अवैध व्यापार का राज
भारतीय वन्यजीव संस्थान ने गैंडों की सींग की तस्करी पर लगाम लगाने के लिए डीएनए आधारित एक नई तकनीक विकसित ...और पढ़ें


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सुमन सेमवाल, देहरादून। गैंडों की सींग की तस्करी पर शिकंजा कसने के लिए विज्ञानियों ने डीएनए आधारित एक ऐसा तरीका विकसित किया है, जो जब्त किए गए गैंडे के अवैध उत्पाद को उसके राज्य और स्रोत आबादी तक पहुंचाने में मदद कर सकता है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) के ताजा अध्ययन ‘डीएनए डिटेक्टिव: जेनेटिक्स के जरिए गैंडा तस्करी की पड़ताल’ में इस आनुवंशिक फोरेंसिक प्रणाली की प्रभावशीलता को प्रमाणित भी कर लिया गया है।
अध्ययन ‘भारत में गैंडा डीएनए इंडेक्सिंग प्रणाली लागू करना, तस्करी के खतरे से निपटना और गैंडा आबादी प्रबंधन में मदद करना-चरण दो’ परियोजना के तहत किया गया। परियोजना के प्रधान अन्वेषक डा सम्राट मंडल के अनुसार परियोजना पर वर्ष 2025 में कार्य किया गया और इसे वर्ष 2027 तक पूरा किया जाना है।
नौ संरक्षित क्षेत्रों से जुटाया आनुवंशिक आधार
विज्ञानियों ने चार राज्यों के नौ गैंडा-बहुल संरक्षित क्षेत्रों से जैविक नमूने जुटाए। इनमें दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, वाल्मीकि टाइगर रिजर्व, गोरूमारा राष्ट्रीय उद्यान, जलदापाड़ा राष्ट्रीय उद्यान, मानस राष्ट्रीय उद्यान, पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य, ओरांग राष्ट्रीय उद्यान, लाओखोवा-बुराचापोरी वन्यजीव अभयारण्य और काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान शामिल हैं।
12 सूक्ष्म उपग्रह आनुवंशिक चिह्नों (एसटीआर) के आधार पर भारत के 1,373 अलग-अलग गैंडों की पहचान की गई। इसके साथ 111 जंगली गैंडों के पूर्ण माइटोकान्ड्रियल जीनोम का विश्लेषण कर राज्य-विशिष्ट आनुवंशिक संकेत तैयार किए गए।
पहले राज्य, फिर स्रोत आबादी की पहचान
शोध में जब्त गैंडा उत्पाद की उत्पत्ति पता लगाने के लिए दो चरणों वाली आनुवंशिक जांच अपनाई गई। माइटोकान्ड्रियल डीएनए से पहले राज्य की पहचान की गई। इसके बाद एसटीआर आधारित बायेसियन क्लस्टरिंग और स्ट्रक्चर विश्लेषण से संबंधित आबादी निर्धारित की गई। वैज्ञानिकों ने एलील फ्रीक्वेंसी मैप भी तैयार किया।
माइटोकान्ड्रियल डीएनए से जब्त गैंडा उत्पादों को संबंधित राज्य से जोड़ने में 100 प्रतिशत सफलता मिली। वहीं 37 जब्त गैंडा उत्पादों में 98 प्रतिशत से अधिक को उनकी स्रोत आबादी से जोड़ा गया। वहीं, शोध में भारतीय गैंडे की छह आनुवंशिक उप-आबादियां भी सामने आई हैं।
तस्करी की कड़ी तक पहुंचेगा विज्ञानी हथियार
यह तकनीक जब्त सींग की केवल पहचान तक सीमित नहीं है। डीएनए मिलान से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि अवैध गैंडा उत्पाद किस राज्य और किस स्रोत आबादी से आया। इससे वन्यजीव अपराध की जांच में तस्करी के संभावित स्रोत तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक सुराग मिल सकते हैं।
