शिवालिक हिमालय में पहली बार खिला दुर्लभ विशाल कुमुद, नाम 'विक्टोरिया अमेजोनिका'
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, देहरादून में दक्षिण अमेरिका के विशाल जलकुमुद 'विक्टोरिया अमेजोनिका' का शिवालिक हिमालय में पहली बार सफल पुष्पन हुआ है।

देहरादून में विशाल जलकुमुद ने फूल के साथ लिया आकार।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण संवाददाता, देहरादून। शिवालिक हिमालय की धरती पर दक्षिण अमेरिका के अमेजन बेसिन का प्रसिद्ध विशाल जलकुमुद ‘विक्टोरिया अमेजोनिका’ पहली बार खिला है।
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, देहरादून में इस दुर्लभ और आकर्षक जलीय पौधे का सफल पुष्पन हुआ है। विशाल गोलाकार पत्तियों और बेहद अनोखे फूल के लिए प्रसिद्ध यह पौधा दुनिया की असाधारण जलवनस्पतियों में शामिल है।
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के कार्यालयाध्यक्ष डा एसके सिंह के अनुसार इस पौधे को विकसित करने के लिए पिछले दो वर्षों से लगातार प्रयास किए जा रहे थे। अंततः विज्ञानी डा अंबर श्रीवास्तव के प्रयासों से उत्तराखंड में पहली बार इसका सफल पुष्पन संभव हुआ। यह उपलब्धि वनस्पति विज्ञान और जलीय उद्यानिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
महारानी विक्टोरिया के नाम पर पड़ा पौधे का नाम
‘विक्टोरिया अमेजोनिका’ का नाम ब्रिटेन की महारानी क्वीन विक्टोरिया के नाम पर रखा गया है। इसकी विशाल पत्तियां और आकर्षक फूल इसे दुनिया की सबसे चर्चित जलवनस्पतियों में शामिल करते हैं।
अनुकूल परिस्थितियों में इसकी गोलाकार पत्तियां करीब 3 मीटर व्यास तक फैल सकती हैं। पत्तियों के किनारे ऊपर की ओर उठे होते हैं, जबकि निचली सतह की संरचना और कांटेदार हिस्से इसे शाकाहारी जीवों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
48 घंटे में बदल जाता है फूल का रंग
इस पौधे का पुष्पन भी बेहद अनोखा है। फूल आमतौर पर शाम के समय पहली बार खिलता है और उस समय उसका रंग सफेद होता है। करीब 24 घंटे बाद जब फूल दोबारा खिलता है तो उसका रंग गुलाबी से बैंगनी-लाल दिखाई देने लगता है। फूल का पूरा जीवनचक्र लगभग 48 घंटे का होता है।
पहली बार खिलने के दौरान फूल से मीठी और अनानास जैसी सुगंध निकलती है। यह सुगंध और फूल की विशेष संरचना इसके प्राकृतिक परागणकर्ताओं, खासकर स्कारब भृंगों, को आकर्षित करती है।
अमेजन से शिवालिक तक पहुंची जलवनस्पति
‘विक्टोरिया अमेजोनिका’ मूल रूप से दक्षिण अमेरिका के अमेजन नदी बेसिन के शांत और उथले जल क्षेत्रों में पाई जाती है। भारत में इसे मुख्य रूप से संवर्धित पौधे के रूप में उगाया जाता है। ऐसे में शिवालिक हिमालय की परिस्थितियों में इसका सफल विकास और पहली बार पुष्पन विशेष महत्व रखता है।
