विकास धूलिया, देहरादून : Uttarakhand Politics : भाजपा हाईकमान ने मदन कौशिक को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी से मुक्त क्या किया, कांग्रेस के दिग्गज और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के दिल में उनके प्रति प्यार उमड़ आया।

हरदा की तुरंत प्रतिक्रिया आई, कौशिक बहुत जुझारू नेता हैं, उन्होंने विपक्ष के नेता के रूप में मेरी सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हो सकता है शब्द कुछ इधर-उधर हों, लेकिन हरदा के कहने का ऐसा ही कुछ आशय था।

दरअसल, ऐसा कहकर हरदा ने एक तीर से कई निशाने साध डाले। लगभग डेढ़ वर्ष बाद लोकसभा चुनाव हैं, हरदा हरिद्वार से दावेदारी ठोकेंगे, इसमें कोई शक नहीं।

हरिद्वार से भाजपा सांसद रमेश पोखरियाल निशंक से मुकाबला उनके लिए कोई आसान नहीं होगा, लिहाजा कौशिक से सहानुभूति जता भाजपा खेमे में संदेह तो पैदा कर ही सकते हैं। निशंक और कौशिक, दोनों भाजपा के धुरंधर हैं, हरदा के मायाजाल में फंसेंगे, वैसे लगता तो नहीं है।

युवा चेहरों के हवाले अब मिशन 2024

सत्तारूढ़ भाजपा हो या विपक्ष कांग्रेस, दोनों ने ही भविष्य की राजनीति को केंद्र में रख कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। भाजपा ने विधानसभा चुनाव से छह महीने पहले पुष्कर सिंह धामी को सरकार की कमान सौंपी।

धामी राज्य के अब तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री हैं। हाल में भाजपा ने संगठन में भी बदलाव कर युवा चेहरे के रूप में महेंद्र भट्ट को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। यानी सरकार और संगठन, दोनों का नेतृत्व अब युवा है।

उधर, कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद प्रदेश अध्यक्ष गणेश पद से गोदियाल को हटा करन माहरा को जिम्मा दिया। करन भी युवा हैं।

एक मजेदार संयोग यह कि महेंद्र भट्ट और करन माहरा पूर्व विधायक हैं और इस विधानसभा चुनाव में दोनों जीत हासिल नहीं कर पाए थे। यह देखना दिलचस्प रहेगा कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में किस पार्टी का युवा नेतृत्व भारी पड़ता है।

धामी फार्मूले से निकलेगा समाधान का रास्ता

इन दिनों सरकारी कार्मिक व सरकार आमने-सामने हैं। हुआ यह कि सरकार ने भविष्य में रिक्त होने वाले कार्मिकों का वेतन किसी भी परिस्थिति में केंद्र से अधिक नहीं रखने के आदेश जारी किए हैं।

मंत्रिमंडल ने वेतन विसंगति समिति की संस्तुति पर यह निर्णय लिया। इससे होगा यह कि भविष्य में नियुक्त होने वाले कार्मिकों को वर्तमान में कार्यरत संवर्गों की तुलना में कम वेतनमान मिलेगा।

कर्मचारी संगठन इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अंदेशा है कि इस आदेश को आधार बनाकर सेवानिवृत्ति पर उन्हें मिलने वाले देयकों और पेंशन के निर्धारण पर प्रभाव डाला जा सकता है।

अब यह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए अग्नि परीक्षा बन गया है। कर्मचारी संगठनों को समझाने-बुझाने को मुख्यमंत्री वेतन-भत्तों के बढ़ते भार, सीमित वित्तीय संसाधन और जीएसटी प्रतिपूर्ति मिलने पर लगी रोक से राज्य की बढ़ती कठिनाइयों को उनके सामने रखेंगे। उम्मीद है धामी का फार्मूला काम कर जाएगा।

राजनीतिक समायोजन के इंतजार में भाजपाई दिग्गज

उत्तराखंड में भाजपा पिछले आठ वर्षों से एकछत्र राज कर रही है। इस अवधि में दो लोकसभा चुनावों में पांचों सीटों पर जीत का परचम फहराया और लगातार दो विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर सरकार बनाई।

यह सब तो ठीक, लेकिन भाजपा इस सुखद स्थिति में भी पसोपेश में है। दरअसल, भाजपा के पास इतने पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष इकट्ठे हो गए हैं कि इन्हें कहां समायोजित करें, नेताओं को समझ नहीं आ रहा।

इन दिनों पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत दिल्ली में केंद्रीय नेताओं से मुलाकात में व्यस्त हैं, यहां चर्चा है कि भाजपा उन्हें संगठन में कोई अहम जिम्मेदारी देने जा रही है।

अब इसमें कितनी सच्चाई है, पता नहीं, लेकिन इस फेहरिस्त में ताजा नाम मदन कौशिक का भी जुड़ गया है। उन्हें हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष पद से विदा किया गया। त्रिवेंद्र या मदन, किसी का तो नंबर लगने जा रहा है।

Edited By: Nirmala Bohra