केदार दत्‍त, देहरादून: Uttarakhand News मानव-वन्यजीव संघर्ष से जूझ रहे उत्तराखंड में वन्यजीवों के हमलों में कमी दिख रही है। विभागीय आंकडे़ इसकी बानगी हैं। इस वर्ष अब तक हाथी, गुलदार व सांप के हमलों में पिछले वर्षों की तुलना में काफी कमी आई है।

खुशफहमी पालना होगी जल्दबाजी 

यद्यपि, साल खत्म होने में अभी तीन माह से अधिक समय बाकी है। यह स्थिति वासस्थल विकास पर ध्यान केंद्रित करने से हुई अथवा विभाग की ओर से उठाए गए कदमों से, कारण चाहे जो भी हों, लेकिन इसे लेकर बहुत अधिक खुशफहमी पालना जल्दबाजी होगी। असल चुनौती विभाग के सामने अब यही है कि आने वाले दिनों में भी वन्यजीवों के हमलों में और अधिक गिरावट लाई जाए।

संरक्षण में महत्‍वपूर्ण भूमिका

यह किसी से छिपा नहीं है कि 71.05 प्रतिशत वन भूभाग वाला उत्तराखंड वन्यजीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, लेकिन यही वन्यजीव स्थानीय समुदाय के लिए परेशानी का कारण भी बने हुए हैं।

बना हुआ वन्यजीवों का आतंक

पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्र तक वन्यजीवों का आतंक बना हुआ है। विशेष रूप से गुलदार, हाथी, बाघ, भालू जैसे जानवरों के बढ़ते हमले अधिक चिंता बढ़ा रहे हैं। यद्यपि, कोरोनाकाल के बाद से हमलों में कुछ कमी भी दिख रही है।

2020 में गुलदार के 115 हमले हुए

आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2020 में गुलदार के 115 हमले हुए, जबकि इस बार अब तक यह संख्या 56 है। इसी तरह 2020 में हाथियों के 19 हमले हुए, जबकि इस वर्ष अब तक यह आंकड़ा नौ पर बना हुआ है। यही नहीं, सांपों के हमले भी काफी कम हुए हैं, जबकि वर्षाकाल अब समाप्ति की ओर है। भालू के हमलों में कमी नजर आ रही है। यद्यपि, इस बार बाघ के हमले बढ़े हैं।

वर्ष 2020 में बाघों ने 11 बार मनुष्य पर हमले किए, जबकि इस वर्ष अब तक यह संख्या 15 पहुंच गई है। बाघों ने इस वर्ष अभी तक कार्बेट टाइगर रिजर्व से लगे क्षेत्रों में 11 व्यक्तियों की जान ली है।

कमी के मुख्य कारण

  • कोरोनाकाल के दौरान जंगलों में मानवीय हस्तक्षेप में आई कमी।
  • विभाग ने वन क्षेत्रों में वासस्थल विकास पर केंद्रित किया ध्यान।
  • संवेदनशील क्षेत्रों में वनकर्मियों की नियमित रूप से गश्त।
  • जनसहयोग से सूचना तंत्र को बनाया गया अधिक प्रभावी।

अब ये है चुनौती

  • वन्यजीव जंगल की देहरी न लांघे, इसके लिए उठाने होंगे ठोस कदम।
  • संघर्ष की रोकथाम के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार कर धरातल पर उतारना।
  • गुलदारों के आंतक से निजात दिलाने को नई रणनीति के साथ कदम बढ़ाना।
  • वन्यजीवों के व्यवहार का अध्ययन कर इसके अनुरूप कदम उठाना।
  • संघर्ष रोकने के उपायों में स्थानीय समुदाय का सक्रिय सहयोग।

डा समीर सिन्हा (मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक उत्तराखंड) ने कहा कि यह सही है कि इस साल अब तक वन्यजीवों के हमलों में कमी आई है। इससे उम्मीद की किरण जगी है, लेकिन सुकून वाली स्थिति को लेकर अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। हमारा प्रयास है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष थामने के लिए और बेहतर प्रयास किए जाएं। इस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। स्थिति पर लगातार पैनी नजर बनी हुई है।

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Edited By: Sunil Negi