केदार दत्त, देहरादून। पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड में जंगल और विकास के मध्य सामंजस्य का मसला सर्वाधिक चर्चा के केंद्र में है। जिस राज्य में 71.05 फीसद क्षेत्र वन भूभाग हो और रिहायश, खेती व विकास को महज 29.95 फीसद भूमि उपलब्ध हो, वहां ये जरूरी भी है। विचारणीय प्रश्न है कि समन्वय के मसले पर हम कहां खड़े हैं। सरकारी आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो यह सूबा प्रतिवर्ष तीन लाख करोड़ से अधिक की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। इसमें अकेले जंगलों की भागीदारी करीब एक लाख करोड़ रुपये की है। अब तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये। वनों का संरक्षण यहां की परंपरा का हिस्सा है, लेकिन वन कानूनों के कारण स्थानीय निवासियों के हक-हकूक पर असर पड़ा है। तमाम विकास योजनाएं वन कानूनों के कारण अटकी हैं। बात समझने की है कि जंगल जरूरी हैं और विकास भी। इनमें बेहतर तालमेल का उचित रास्ता तो नीति-नियंताओं को निकालना ही होगा।

पौधारोपण को मिल सकेगी गुणवत्तायुक्त पौध

उत्तराखंड के वन क्षेत्रों में हर साल ही डेढ़ से दो करोड़ पौधों का रोपण होता है, लेकिन हर बार ही गुणवत्तायुक्त पौध का रोना भी रोया जाता है। पिछले 21 साल में हुए पौधारोपण का ही हिसाब लगाएं तो अब तक 30-40 करोड़ पौधे लग चुके हैं, मगर जीवित कितने रहे, यह किसी से छिपा नहीं है। जाहिर है कि इसमें गुणवत्तायुक्त पौध की कमी भी एक कारण है। अब वन विभाग ने इसे दूर करने की ठानी है। इसके तहत प्रदेशभर में हाईटेक नर्सरियां स्थापित की जा रही हैं। विभाग की अनुसंधान विंग ऐसी छह नर्सरी स्थापित कर चुका है, जबकि अन्य प्रभागों में भी यह मुहिम चल रही है। इन नर्सरियों में उत्तम गुणवत्ता की पौध आधुनिक तरीके से तैयार की जाएगी। इससे गुणवत्तायुक्त पौध की कमी तो दूर होगी ही, विभिन्न प्रजातियों का इनमें संरक्षण भी होगा। ऐसे में सबकी निगाहें इस पर टिकी हुई हैं।

अब सामने आएगी गुलदारों की संख्या

मानव-वन्यजीव संघर्ष से जूझ रहे उत्तराखंड में गुलदारों के लगातार बढ़ते हमलों ने सर्वाधिक नींद उड़ाई हुई है। प्रदेशभर में जिस तरह से इनके हमले बढ़ रहे हैं, उससे यह संभावना जताई जा रही है कि गुलदारों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, लेकिन इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। वजह यह कि वर्ष 2008 के बाद राज्य में गुलदारों की संख्या का आकलन नहीं हुआ है। तब यहां 2300 से अधिक गुलदार होने का अनुमान लगाया गया था।

अब अगले माह से राज्य स्तर पर होने वाली बाघ गणना के दौरान गुलदारों का भी आकलन किया जाएगा। इससे यह साफ हो सकेगा कि वास्तव में इनकी संख्या में इजाफा हुआ है या नहीं अथवा इनके निरंतर बढ़ते हमलों के पीछे अन्य कोई कारण हैं। गुलदारों का क्षेत्रवार सही आंकड़ा मिलने के बाद इस समस्या के समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। यह समय की मांग भी है।

फिर लटका राजाजी रिजर्व का टीसीपी

किसी भी टाइगर रिजर्व के लिए उसका टाइगर कंजर्वेशन प्लान सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसी के आधार पर संबंधित टाइगर रिजर्व के प्रबंधन की कार्ययोजना तैयार की जाती है। इस लिहाज से देखें तो वर्ष 2015 में अस्तित्व में आए राजाजी टाइगर रिजर्व का टाइगर कंजर्वेशन प्लान (टीसीपी) अभी तक तैयार नहीं हो पाया है। हालांकि, पूर्व में इसे लेकर कसरत हुई, लेकिन इसमें कई खामियां थीं।

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शासन स्तर पर इन्हें दूर करने के सुझाव दिए गए और फिर इसका प्रस्तुतीकरण भी हुआ, लेकिन मसला लटक गया। लंबे इंतजार के बाद अब शासन ने राजाजी के टीसीपी को लेकर सक्रियता दिखाई और कुछ अन्य सुझाव देते हुए वन विभाग को इसे तैयार करने के निर्देश दिए। इससे संबंधित प्रस्ताव राज्य वन्यजीव बोर्ड की बैठक में अनुमोदन के लिए रखा जाना था, लेकिन प्रदेश में आई आपदा के दृष्टिगत बोर्ड की बैठक टल गई। ऐसे में टीसीपी का मसला भी एक बार फिर लटक गया।

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Edited By: Raksha Panthri