सुमन सेमवाल, देहरादून। Uttarakhand Vidhan Sabha Election 2022 उत्तराखंड के शहरी व अर्ध शहरी क्षेत्रों में आबादी का दबाव निरंतर बढ़ रहा है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर गौर करें तो देश में शहरी आबादी जहां 31.80 फीसद की दर से बढ़ी है, वहीं उत्तराखंड में यह दर 41.86 फीसद रही। कोरोना के संक्रमण के चलते 2021 की जनगणना नहीं हो पाई, मगर तेजी बढ़ते शहरों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि रफ्तार पहले से कहीं अधिक हो चुकी है। बढ़ती आबादी के दबाव में शहरों के संसाधन सिमटने लगे हैं। उच्च से लेकर मध्यम, निम्न मध्यम और निम्न आय वर्ग तक का तबका शहरों की दौड़ लगा रहा है।

चुनाव का मौसम है तो बढ़ती आबादी को बढ़ते वोट बैंक के रूप में भी देखा जा सकता है। राजनीतिक दलों और दावेदारों की आंखों की चमक घनी आबादी वाले क्षेत्रों को देखकर और बढ़ जाती है। पर क्या वोट बैंक के गणित को काफी हद तक प्रभावित करने की क्षमता रखने वाली शहरी आबादी की मूलभूत सुविधाएं चुनावी एजेंडों में प्रमुखता से शामिल रहती है। यदि रहती हैं तो चुनाव के बाद उन सुविधाओं का क्या होता है? 70 सीटों वाले उत्तराखंड में 50 सीटों पर छोटे-बड़े शहरी क्षेत्र व बाकी सीटों पर अर्ध शहरी क्षेत्र आते हैं।

राज्य गठन के बाद यह पांचवां विधानसभा चुनाव है और अभी भी शहरी विकास के तमाम सवाल हल होने बाकी हैं। विशेषकर शहरों में कूड़ा प्रबंधन, सीवरेज व्यवस्था, जल निकासी, आवास की सुलभ व्यवस्था की मंजिल अभी दूर ही नजर आती है। शहरी मतदाता भी अपने तरीके से हर एक चुनाव में दलों और दावेदारों के शहरी विकास के वादों का आकलन करता है और बाद में उनकी हकीकत भी देखता है। इस दफा भी चुनाव में शहरी विकास एक बड़ा मुद्दा है। आइए जानते हैं मत तय करने के लिए मतदाता किन-किन कसौटी पर दलों और दावेदारों को आंकता दिख रहा है और उन मुद्दों की वर्तमान हकीकत क्या है।

कूड़े के ढेर पर बैठे हैं शहर

तेजी से बढ़ते शहरों में कूड़ा प्रबंधन बड़ी चुनौती बन रहा है। शहरी विकास निदेशालय के आंकड़ों पर गौर करें तो हमारे शहरों से रोजाना 1553 टन (एक लाख 55 हजार 300 किलो) कचरा निकलता है। हालांकि, वास्तविक रूप से यह आंकड़ा और भी अधिक है। निदेशालय के ही एक और दावे पर गौर करें तो महज 65 प्रतिशत कचरे का ही निस्तारण हो पाता है। बाकी कूड़ा कहीं नदी-नालों को प्रदूषित करता है, कहीं सड़कों पर सड़ांध फैलाता है, तो कहीं वन क्षेत्रों में पड़ा रहता है। कूड़ा निस्तारण की स्थिति देखकर कोई भी जागरूक शहरी व्यक्ति संतुष्ट नजर नहीं आता। केंद्र सरकार की स्वच्छ भारत मुहिम के बीच वह देख रहा है कि इस दिशा में प्रदेश कहां खड़ा है। स्वच्छता के दावों और उनकी हकीकत भी उससे छिपी नहीं है।

जब वह कूड़ा प्रबंधन के पैमाने पर प्रत्याशियों को परखेगा तो जाहिर है, अपना मत भी व्यक्त करेगा। खैर, कूड़ा प्रबंधन की एक और हकीकत भी जाननी जरूरी है। वह यह कि किस शहर में कूड़ा निस्तारण के प्लांट लगे हैं और कहां इसकी परियोजना पाइप लाइन में है। सिर्फ देहरादून, मसूरी, हरबर्टपुर, विकासनगर व हरिद्वार ही ऐसे शहर हैं, जहां सालिड वेस्ट मैनेजमेंट के प्लांट कार्य कर रहे हैं। परियोजना में चयनित बाकी 57 शहर अभी इंतजार की मुद्रा में हैं। हालांकि, थोड़ा संतोष की बात यह है कि इन सभी शहरों में प्लांट लगाने की योजना स्वीकृत हो चुकी है और उन पर काम भी चल रहा है। जाहिर है, शहरी मतदाता अपने क्षेत्र के प्रत्याशियों से यह सवाल जरूर पूछेंगे कि कूड़ा निस्तारण और इससे जुड़ी समस्याओं से शहर को मुक्ति कब मिलेगी।

स्वच्छ सर्वेक्षण का प्रदर्शन भी बनेगा पैमाना

स्वच्छ सर्वेक्षण में हमारे शहर हौले-हौले जरूर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन मंजिल अभी दूर है। बीते स्वच्छ सर्वेक्षण में हमारे शहरों ने यह बताने का प्रयास जरूर किया कि यदि थोड़ा ध्यान और दिया जाए तो वह बेहतर कर सकते हैं। विशेषकर राष्ट्रीय स्तर पर 659 शहरों में राजधानी देहरादून को 134वीं रैंक मिली, जबकि नगर निगम श्रेणी के 372 शहरों में से दून की रैंक 82वीं रही। इस श्रेणी में दून ने अपनी रैंक में 302 अंकों का सुधार भी किया। इसी के साथ प्रदेश के अन्य शहरों के मुकाबले दून पहले स्थान पर भी रहा। हालांकि, देश के टाप शहरों के मुकाबले अभी हमारी मंजिल दूर नजर आती है। उन शहरों से अधिक उम्मीद है, जिन्होंने राज्य के बाकी शहरों से बेहतर प्रदर्शन किया। शहरी मतदाता यह चाहते हैं कि प्रदेश में अच्छा करने वाले शहर राष्ट्रीय स्तर पर भी खास मुकाम हासिल कर पाएं। ऐसे में वह चुनाव में ऐसे प्रत्याशियों पर भरोसा जताना चाहेंगे जिनमें शहरी विकास की सोच हो और वह उसे पूरा करने की क्षमता भी रखते हों।

लक्ष्य 40 हजार से अधिक का, तैयार 464 आवास

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत शहरों के निम्न आय वर्ग के व्यक्तियों के लिए सस्ते आवास का ख्वाब दिखाया था। सभी विकास प्राधिकरणों व उत्तराखंड आवास विकास परिषद को 40 हजार से अधिक आवास तैयार करने का लक्ष्य दिया गया था। वर्ष 2022 तक आवास उपलब्ध कराए जाने थे। इस दिशा में अभी तक सिर्फ मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण 464 आवास तैयार कर पाया है। बाकी विकास प्राधिकरण व परिषद स्तर पर तैयार किए गए प्रस्तावों को धरातल पर उतरना बाकी है।

इतना जरूर है कि प्रदेश में 19 हजार 984 से अधिक आवास निर्माण की परियोजना या तो स्वीकृत हो चुकी हैं या स्वीकृति के अंतिम चरण में है। आवास वह बुनियादी सुविधा है, जो शहरों में सुलभ नहीं है। ऐसा नहीं है कि आवास का मुद्दा राजनीतिक दलों व दावेदारों की जुबां पर नहीं रहता। बस, फर्क सिर्फ इतना है कि चुनाव के बाद इस मुद्दे को भुला दिया जाता है। देखते हैं इस चुनाव में प्रत्याशी आवास की आस पर मतदाताओं को क्या घुट्टी पिलाते हैं और मतदाता उन पर कितना यकीन कर पाता है।

यातायात का दबाव कहां तक झेलेंगी सड़कें

देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, रुड़की, काशीपुर, रुद्रपुर, हल्द्वानी ऐसे प्रमुख शहर हैं, जहां यातायात का दबाव सर्वाधिक बढ़ा है। बीते 22 सालों में यहां सड़कों का विस्तार महज 20 प्रतिशत हो पाया है, जबकि वाहनों का दबाव 200 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। सड़कें या तो संकरी हैं या उन पर कहीं अतिक्रमण हैं, कहीं बाजार सजे हैं, तो कहीं फुटपाथ ही नहीं हैं। अब तक के किसी भी विधानसभा चुनाव में जाममुक्त सड़कें ढंग से मुद्दा नहीं बन पाई। स्थिति यह है कि अब छोटे शहरों में भी जाम की समस्या पेश आने लगी हैं। शहरी व्यक्ति रोजमर्रा के जाम से परेशान हैं और एक हद तक इसे नियति भी मान चुके हैं। मतदाताओं ने भी कभी शहरों में बढ़ते जाम को लेकर प्रत्याशियों से दो टूक सवाल नहीं किए। यही कारण है कि निर्बाध यातायात बड़ा मुद्दा होने के बाद भी हाशिये पर रहा। देखने वाली बात यह होगी कि इस चुनाव में शहरी मतदाता जाममुक्त सड़कों को लेकर प्रत्याशियों को कितना कस पाते हैं।

शुरुआत हुई, मंजिल अभी दूर

तमाम छोटे-बड़े शहरों में पेयजल, सीवरेज व जल निकासी की योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए उत्तराखंड अर्बन सेक्टर डेवलपमेंट एजेंसी (यूयूएसडीए) 6712 करोड़ रुपये की योजनाओं पर काम कर रहा है। हालांकि, इसके केंद्र में प्रथम चरण में देहरादून व नैनीताल को ही शामिल किया गया है। फिर भी अगले चरण में 14 शहर शामिल किए गए हैं। लंबे समय बाद इस तरह शहरों की सुध ली गई है, लिहाजा मतदाता इन योजनाओं को किस रूप में लेंगे, यह तो वक्त ही बताएगा। इतना जरूर है कि धीरे-धीरे शहरी विकास की सुध ली जा रही है। मंजिल दूर है और शुरुआत अभी हुई है तो पिछले अनुभव भी मतदाताओं के मत को प्रभावित कर सकते हैं। क्योंकि अभी तक शहर बसावट के केंद्र में तो रहे हैं, लेकिन सुविधाओं की तरफ खास ध्यान नहीं दिया गया। मतदाताओं के मन में यह सवाल भी उठेगा कि पहले व दूसरे चरण के बाद बाकी शहरों की सुध कब ली जाएगी?

नदी-नालों पर अतिक्रमण का सवाल

शहर बढ़ तो रहे हैं, मगर उनकी सुंदरता पर निरंतर ग्रहण लग रहा है। वोट बैंक की फसल उगाने के लिए नेतागण नदी-नालों पर अतिक्रमण कराकर अवैध बस्तियों को बसाने में अधिक सक्रिय दिखते हैं। राजनीतिक दलों व दावेदारों के इन पैंतरों से कुछ वर्ग के वोट तो प्रभावित किए जा सकते हैं, मगर शहर को कुरूप होता देखा बाकी शहरी मतदाता इससे संतुष्ट नहीं दिखता। यह किसी से छिपा नहीं है कि हाईकोर्ट के अतिक्रमण हटाने के आदेश के बाद क्या हुआ। सफेदपोश ही अतिक्रमण हटाने के विरोध में एकजुट हो गए। लिहाजा, नदी-नालों पर अतिक्रमण कराने का एक पक्ष मलिन बस्ती वोट बैंक है, तो दूसरा पक्ष वह जागरूक मतदाता है, जिसे अतिक्रमण से खासी चिढ़ होती है। शहरी विकास के प्रति बीते कुछ सालों में मतदाता जागरूक हुए हैं और इसका प्रभाव भी चुनाव में देखने को मिल सकता है।

इन शहरों में सीवरेज, पेयजल व जल निकासी की योजनाएं प्रस्तावित

देहरादून, डोईवाला, विकासनगर, काशीपुर, रुद्रपुर, पिथौरागढ़, किच्छा, खटीमा, गोपेश्वर, जोशीमठ, श्रीनगर, टनकपुर, चंपावत, अल्मोड़ा, बागेश्वर।

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Edited By: Raksha Panthri