राज्य ब्यूरो, देहरादून। Uttarakhand Election 2022 उत्तराखंड पांचवीं विधानसभा चुनने जा रहा है। लोकतंत्र के उल्लास और उत्सव के इस अवसर पर जनता को लुभाकर सत्ता पाने की राजनीतिक दलों की इच्छाएं स्वाभाविक रूप से हिलोरें ले रही हैं। विकास को लेकर छटपटाती जन आकांक्षाओं के गर्भ से 21 साल पहले जन्मा राज्य अब परिपक्व होती युवावस्था की ओर बढ़ चला है। आमदनी के सीमित संसाधनों से जूझते इस छोटे राज्य के सामने उसकी माली हालत हिमालय सरीखी चुनौती है। चुनाव की इस बेला में लुभावने वायदों और घोषणाओं की चाशनी जनता को परोसी जा रही है। जन अपेक्षाओं को नई उम्मीदों में ढालकर मतदाताओं को सुनहरे सपनों की दुनिया की सैर भी कराई जा रही है। सच्चाई ये है कि सब कुछ सच की तरह सामने खड़े प्रश्नों से मुंह चुराते हुए हो रहा है। 21 सालों में हर सालाना बजट में बामुश्किल केवल 15 प्रतिशत धनराशि विकास, निर्माण और जन कल्याणकारी कार्यों के लिए जुटाई जाती है। इस राशि में भी बड़ा दारोमदार केंद्र से मिलने वाली आर्थिक मदद पर टिका है। गांव-गांव, घर-घर पानी, बिजली पहुंचाने, सड़कों के नेटवर्क से लेकर ढांचागत विकास केंद्रीय मदद पर टिका है। सरकारें 15 प्रतिशत राशि का भी सदुपयोग नहीं कर पा रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में बिजली, पानी, सड़कों, स्वास्थ्य सुविधाओं समेत ढांचागत विकास को प्राथमिकता से नया विश्वास भी जगा है। राज्य की अर्थव्यवस्था और बजट की पथरीली और कंटीली सड़क पर सत्ता के आकांक्षी दलों को आगे बढ़ना है, उनके समक्ष चुनौतियों पर रविंद्र बड़थ्वाल की रिपोर्ट।

बजट का सदुपयोग न होना चिंताजनक

प्रदेश की नई सरकार आगामी मार्च में जब सत्ता संभालकर नया वार्षिक बजट प्रस्तुत करेगी, तो बजट आकार 65 हजार करोड़ रुपये को पार कर जाएगा। राज्य के सामने पिछले 20 वर्षों से गंभीर स्थिति बजट आकार, बजट स्वीकृति और खर्च में बड़ी खाई के रूप में है। इससे बजट निर्माण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठते हैं। बजट आकार और खर्च में बड़ा अंतर यह दर्शाता है कि गुलाबी वायदे हकीकत में नहीं बदल रहे हैं। नई योजनाओं को बजट में स्थान देने का उत्साह, जमीन पर उन्हें उतारने की कवायद में ढीला पड़ जाता है। धन की कमी, विकास व निर्माण कार्यों की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में खामियों और फिर बजट स्वीकृति से लेकर खर्च में शासन से लेकर विभागों के सुस्त रवैये से पार पाना अगली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।

जीएसडीपी पर 10 हजार करोड़ की चोट

कोरोना महमारी ने दो सालों से राज्य की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट की है। इसका असर हर क्षेत्र पर पड़ा है। राज्य सकल घरेलू उत्पाद और आर्थिक विकास दर पर महामारी ने बुरा असर छोड़ा है। सबसे अधिक चोट विकास कार्यों पर पड़ी है। कोरोना संकट के कारण 2020-21 में जीएसडीपी को 2019-20 की तुलना में 10 हजार करोड़ से बड़ा झटका लगा है। यह 2,43012 करोड़ तक सिमटने का अनुमान है। चालू वित्तीय वर्ष में संकट से उबरने के अनुमान के सामने कोरोना की तीसरी लहर का अंदेशा दस्तक दे रहा है।

बजट आकार और खर्च में बड़ा अंतर

बीते वित्तीय वर्ष 2020-21 में बजट आकार और खर्च का अंतर 20 हजार करोड़ से ज्यादा रहा। इससे पहले वर्ष में यह अंतर 13 हजार करोड़ रुपये था। बजट आकार को बड़ा रखने की जितनी मारामारी की जाती है, उसे खर्च करने को इच्छाशक्ति सिरे से नदारद दिखती रही है। चालू वित्तीय वर्ष में नौ माह बीतने के बाद भी बजट आकार की तुलना में खर्च के लिए महज 59 प्रतिशत राशि स्वीकृत की गई, जबकि इसमें से भी खर्च 66 प्रतिशत ही हो पाया है। बजट की यह स्थिति विषम व पर्वतीय क्षेत्रों में सामाजिक-आर्थिक विषमता की खाई को ज्यादा चौड़ा कर देती है। केंद्रपोषित योजनाओं और बाह्य सहायतित योजनाओं की राज्य के ढांचागत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका है। इन योजनाओं में भी हर साल 1000 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च नहीं हो पाती। खर्च की गति बढ़ने का सीधा प्रभाव अवस्थापना विकास में तेजी के रूप में दिखाई देगा। ऐसा हुआ तो राज्य को पलायन, रोजगार, आजीविका जैसी समस्याओं से निपटने में मदद मिल सकती है।

वित्तीय वर्ष, कुल बजट, खर्च, अंतर

(राशि:करोड़ रुपये)

2021-22, 63459.65, 24488, (वित्तीय वर्ष में तीन माह बाकी)

2020-21, 57590.76, 37163.01, 20437

2019-20, 51145.29, 37349.12, 13796.17

2018-19, 47884.28, 29542.05, 18,342.23

राज्य का अपना कर राजस्व

2002-03, 1079 करोड़

2012-13, 6414 करोड़

2017-18, 10895 करोड़

2021-22, 12754 करोड़ (2020 से लेकर 22 तक कोरोना महामारी का असर)

राज्य का अपना गैर कर राजस्व:

2002-03, 375 करोड़

2012-13, 899 करोड़

2017-18, 1769 करोड़

2021-22, 2494 करोड़, अनुमानित

कोरोना काल में आय को लगी चपत

राज्य में आय बढ़ाने को लेकर गंभीर कदम नहीं उठाए जाने का परिणाम ये हुआ कि खर्च बढऩे की दर आमदनी की तुलना में तेजी से बढ़ गई। कोरोना महामारी में खर्च में कमी नहीं आई, अलबत्ता आमदनी घट गई। करों से मिलने वाली आय पर कोरोना महामारी ने भी कहर ढाया है। दो साल से करों से मिलने वाली आमदनी लगातार कम होती गई है। उत्तराखंड को 31 मार्च 2019 से लेकर 31 मार्च 2021 तक 1397 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा है।

कोरोना के कारण दो सालों में कर राजस्व में कमी: (राशि: करोड़ रुपये)

वित्तीय वर्ष, कर राजस्व

2018-19, 12188

2019-20, 11513

2020-21, 10791

जीएसटी का संकट

जीएसटी को लेकर राज्य के सामने अगले साल से संकट खड़ा हो सकता है। वैट की जगह जीएसटी लागू होने से उत्तराखंड को राजस्व का नुकसान 3000 करोड़ से अधिक हो रहा है। इस नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार कर रही है। जून, 2022 के बाद केंद्र सरकार ने मुआवजा आगे जारी नहीं रखा तो 3200 करोड़ से ज्यादा का घाटा उठाने की नौबत आएगी। जीएसटी लागू होने से पहले 2016-17 में राज्य की वैट से 7093 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। अगले वर्ष 2017-18 में वैट लागू रहने की स्थिति में इससे होने वाली आमदनी बढ़कर 8648 करोड़ होती।

जीएसटी लागू होने के बाद राज्य को केंद्र से मुआवजा मिलने के बाद भी 7784 करोड़ की आय पर संतोष करना पड़ा है। केंद्र सरकार ने जीएसटी से मुआवजा की समय अवधि पांच वर्ष रखी है। यह अवधि जून, 2022 में खत्म हो जाएगी। जीएसटी मुआवजे के लिए केंद्र ने समय सीमा आगे नहीं बढ़ाई तो राज्य को चालू वित्तीय वर्ष में जीएसटी से होने वाली 13,492 करोड़ की कुल आमदनी अगले वित्तीय वर्ष में घटकर 10,194 करोड़ तक हो जाएगी। इसके बाद के वित्तीय वर्षों में और गिरावट तय है।

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Edited By: Raksha Panthri