रविंद्र बड़थ्वाल, देहरादून। उत्तराखंड राज्य बने हुए 21 साल हो चुके हैं, लेकिन तब से आज तक सबसे ज्यादा चर्चा में अगर कोई मुद्दा रहा, तो वह है नौकरशाही। छोटे राज्य में जिस नौकरशाही को सुशासन का पर्याय होना चाहिए था, वह नजर नहीं आता। दूरदराज गांवों और बस्तियों में रहने वालों को उनकी स्थानीय स्तर की समस्याओं का समाधान आसपास या जिले में ही मिलना चाहिए। उन्हें राजधानी तक दौड़ लगानी पड़ रही है। यह हालत तब है, जब गांवों में भी डिजिटल दुनिया दस्तक दे रही है। कनेक्टिविटी की पहुंच दूरस्थ क्षेत्रों तक हो चुकी है, लेकिन सरकारी कामकाज और प्रशासन से जुड़ी समस्याओं के निदान को लेकर तंत्र की परंपरागत कार्यप्रणाली में जिसतरह परिवर्तन की आवश्यकता है, वह अब भी मृग मरीचिका ही है। जनता के इस दर्द को भांपकर ही सरकारें जनता मिलन, तहसील दिवस से लेकर मुख्यमंत्री हेल्पलाइन जैसी आनलाइन तकनीक से लैस नई व्यवस्था के माध्यम से उसके द्वार तक पहुंचने की जुगत भिड़ाती रही हैं। नौकरशाही और जनता के बीच दूरियां पाटी नहीं जा सकी। शासन से लेकर जिलों, ब्लाकों और तहसीलों में तैनात अधिकारियों के रवैये को लेकर पहली अंतरिम सरकार से उठनी शुरू हुई आवाज पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया एनडी तिवारी के मुख्यमंत्रित्व काल में भी शांत नहीं हुई। राजनीतिक रूप से उनके बड़े व्यक्तित्व के आगे आला अधिकारियों के कद भले ही छोटे पड़ गए, नौकरशाही पूरी तरह कद्दावर बनी रही। पहली से लेकर चौथी विधानसभा में यह मुद्दा गूंजा है। तंत्र की चौखट पर बार-बार दस्तक देने को मजबूर आम जन का यही अनुभव उसके मत व्यवहार को गहरे तक प्रभावित करता है। पांचवीं विधानसभा के लिए हो रहे चुनाव के मौके पर नौकरशाही से जुड़े विभिन्न पहलुओं को खंगालती रविंद्र बड़थ्वाल की रिपोर्ट।

सुशासन बनाम नौकरशाही

जनता की सबसे पहली पसंद सुशासन होती है। शासन जितना चुस्त-दुरुस्त होगा, उतना ही जनजीवन को सुकून मिलेगा। आम मतदाता जब सरकार चुनने के लिए मत देता तो है तो उसके मन-मस्तिष्क में सुशासन की चाह होती है। सरकारी कामकाज की जनहित में बाधारहित और दोस्ताना होने की परिकल्पना की जाती है, लेकिन सच्चाई इसके उलट दिखाई देती है। सरकारी कार्यालयों में छोटे-छोटे कार्यों को पूरा करने के लिए नागरिकों को न सिर्फ जूझना पड़ता है, बल्कि कई परेशानी उठानी पड़ जाती हैं।

जन्म से लेकर मुत्यु के प्रमाणपत्र हों या बिजली व पेयजल संयोजन, इनकी आपूर्ति हो या बिल भुगतान, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत मिलने वाला खाद्यान्न समेत तमाम जन सेवाओं के लिए आज भी सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने की नौबत है। सेवा के अधिकार में अधिसूचित आवश्यक सेवाओं की यह स्थिति है तो अन्य का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। सुशासन का रास्ता भी नौकरशाही से होकर गुजरता है। नौकरशाही बेहतर ढंग से काम करेगी तो सुशासन के रूप में उसका स्वाभाविक परिणाम दिखाई देगा।

जनप्रतिनिधियों में पनपता अविश्वास

नियम-कानूनों को जब पारदर्शिता के साथ जन विश्वास पर खरा उतारने की इच्छाशक्ति नदारद हो और आम आदमी को परेशानी से निजात पहुंचाने को दी जाने वाली राहत में भी अड़ंगा लगने लगे तो फिर तंत्र पर भरोसे का संकट बढऩे लगता है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों में विकास के पिछड़ेपन से उबरने की जिस आकांक्षा ने उत्तराखंड राज्य के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई, उसे निर्माण के रास्ते पर आगे बढऩे में मदद मिलने के बजाय उलझनों से जूझना पड़ रहा है। उत्तराखंड में जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों के बीच अविश्वास का बड़ा कारण यही है।

विधायक, सांसद और पार्षद सरकारी अधिकारियों से पीड़ित दिखाई देते हैं। विधायकों और सांसदों को मिलने वाली निधि का उपयोग व्यवस्था के रहमोकरम पर है। शासन की बात छोड़िए, जिला स्तरीय अधिकारियों के रवैये को लेकर विधायकों से लेकर शहरी और त्रिस्तरीय पंचायतों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में नाराजगी आम है। पर्यावरण समेत विभिन्न प्रकार की पाबंदी से जूझते राज्य में आखिरकार विकास का सुगम रास्ता कैसे तय किया जाए, नौकरशाही इस मामले को सुलझाने के बजाय और उलझाती दिखी है।

नौकरशाहों की हनक से मंत्री भी परेशान

विधायिका और कार्यपालिका एक-दूसरे के पूरक हैं। इसके बावजूद दोनों में टकराव दिखता है। विभागों के सर्वेसर्वा मंत्री भी नौकरशाही से त्रस्त रहते हैं। इनमें कुछ मामले सुर्खियां बटोर लेते हैं, जबकि ज्यादातर में व्यवस्था की इस खामी को सहज तरीके से स्वीकार कर लिया जाता है। संवादहीनता की स्थिति तब गंभीर हो जाती है जब कम अनुभवी मंत्रियों पर तेजतर्रार नौकरशाह भारी पड़ते हैं। उत्तराखंड में यह समस्या हर सरकार के पांच साल के कार्यकाल में सिर उठाती रही है। अब तक ऐसी कोई सरकार नहीं रही, जिसमें मंत्रियों ने नौकरशाही के रवैये को निशाना नहीं बनाया हो। मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बीच खींचतान में नौकरशाही को मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के मामले चर्चा में रहे हैं।

सरकारी दफ्तरों में कामकाज की सुस्त चाल

शासन से लेकर जिलों में प्रशासन और विभागों में फाइलें तेजी से दौड़ेंगी तो निश्चित मानिए, जमीन पर भी विकास कार्य भी रफ्तार पकड़ते दिखाई देंगे। गांव-मुहल्लों की छोटी-संकरी गलियों से लेकर संपर्क और मुख्य मार्गों के निर्माण, अस्पतालों में आवश्यक दवाइयों की उपलब्धता से लेकर जन कल्याण की योजनाओं का बजट समय पर जारी न हो तो इसका सीधा खामियाजा आम आदमी को भुगतना पड़ता है। सस्ता खाद्यान्न सबसे पहले फाइलों पर सवार होकर ही सरकारी दफ्तरों से बाहर निकल पाता है। इसके बाद यह सस्ते गल्ले की दुकानों तक पहुंचता है। सरकारी कार्यालयों में पत्रावलियां जितनी तेजी से निस्तारित होंगी, व्यवस्था में खुशहाली उतना ही पसरेगी। इस तथ्य से सरकारें भी भली-भांति परिचित रही हैं। पत्रावलियों के निस्तारण में तेजी लाने पर तंत्र का मकड़जाल हावी है।

सुशासन के लिए उठाए गए हैं कई कदम

जनता को राहत देने और सुशासन के लिए कई तरह की व्यवस्था अब तक आकार ले चुकी हैं। इनमें सेवा का अधिकार, सूचना का अधिकार जैसे उपाय भी हैं। सेवा के अधिकार के तहत आम जन से मुख्य रूप से जुड़ी सवा सौ से ज्यादा जन सेवाओं को सूचीबद्ध किया जा चुका है। जन सहायता के लिए जिला उपभोक्ता फोरम से लेकर खाद्य आयोग गठन राज्य में गठित हैं। सीएम हेल्पलाइन के माध्यम से भी शिकायतें सीधे मुख्यमंत्री व उच्च स्तर तक पहुंच रही हैं। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और तकनीकी के उपयोग ने जन सेवाओं की राह में आने वाली बाधाओं को दूर किया है। सच्चाई यह भी है कि इन सभी राहतकारी उपायों का समुचित लाभ तब ही मिलेगा, जब तंत्र की व्यवस्था सुधरे। इसमें भी नौकरशाही का पेच तो है ही।

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Edited By: Raksha Panthri