प्रो विनय आनंद बौड़ाई। राजनीतिक दलों को राज्यों की अर्थव्यवस्था को लेकर ज्यादा जागरूकता से काम करना होगा। कर्ज पर लगातार बढ़ती जा रही निर्भरता भयावह रूप ले चुकी है। इसे जानबूझकर नजरअंदाज किया जाएगा, तो गंभीर परिणाम सामने आएंगे। ऋण लेना बुरा नहीं है, लेकिन यह उत्पादक होना चाहिए। यानी ऋण लेने के बाद उसे जिस भी क्षेत्र में खर्च किया जाए, उसमें गुणात्मक सुधार नजर आना चाहिए। घोषणाएं सोच-समझकर होनी चाहिए। वादों को ऐसे पूरा किया जाए कि अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े, साथ ही समाज भी इनसे मिलने वाले लाभ का उपयोग कर क्षमता का विकास करे।

2019 और 2021 के आंकड़े चौंकाने वाली तस्वीर पेश कर रहे हैं। राज्यों पर ऋण का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ा है। इसके बावजूद इससे उबरने के लिए रणनीति सिरे से नदारद है। राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा समेत कई राज्य ऋण के लिए तय सीमा को पार कर चुके हैं। ऋण के लिए सकल राज्य घरेलू उत्पाद के तीन प्रतिशत तक की सीमा निर्धारित की गई है, लेकिन कई राज्य पांच प्रतिशत की सीमा को भी पार कर चुके हैं। यह संकेत है कि आने वाले समय में इन राज्यों को अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर गंभीर परेशानी से जूझना पड़ेगा। बावजूद इसके इन राज्यों में सत्ताधारी और सत्ता में आने के इच्छुक दल लोकलुभावन घोषणाओं का सहारा ले रहे हैं। इसका परिणाम चुनाव के बाद नई सरकार के काम पर भी दिखाई पड़ता है। सरकारें बुनियादी सुधार और इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास पर गंभीरता से काम करने के स्थान पर वादों और घोषणाओं की अगली सूची तैयार करना बेहतर समझने लगती हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि जनता को राहत देना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी ही चाहिए, लेकिन यह सब कुछ अर्थव्यवस्था की कीमत पर न किया जाए। आवश्यकता इस बात की है कि अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाकर आम जन की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए। इससे उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन भी आएगा। सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था में खुशहाली परिलक्षित होगी। राज्यों की ऋण की स्थिति को लेकर रिजर्व बैंक और ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार 2019 में बेस्ट परफामिर्ंग स्टेट में बंगाल पहले स्थान पर था। इसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक और ओडिशा हैं। ऋण लेने में खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में बिहार पहले स्थान पर रहा। पंजाब जैसे संपन्न राज्य का नाम भी खराब प्रदर्शन करने वालों में है। इससे स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश भी हैं। इन राज्यों में भी ज्यादा जोर लुभावनी घोषणाओं पर देखा गया है। राज्यों में एक-दूसरे की देखादेखी ऋण लेने का उतावलापन बढ़ रहा है।

कई अर्थशास्त्री इस पर चिंता जता चुके हैं। दरअसल यह प्रवृत्ति चुनौतियों से जूझने के स्थान पर उनसे भागने का रास्ता तैयार करती है। आर्थिक संसाधन कैसे बढ़ाए जाएं, नीति नियोजन में राज्य के ढांचागत विकास, उत्पादन बढ़ाने और बेहतर प्रदर्शन की चुनौती नदारद है। जनता को इस मोर्चे पर लगातार निराशा हाथ लग रही है। सुशासन की कमी का एक बड़ा कारण आर्थिक स्थिति की अनदेखी है। ऋण लेकर इसे ढका नहीं जाना चाहिए। ऋण का यदि इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास, उद्यमिता और कौशल विकास में उपयोग किया जाएगा तो इसके अच्छे और सार्थक परिणाम दिखाई देंगे। साथ ही समाज और अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने में मदद मिलेगी। बेहतर होगा कि अनुत्पादक ऋण लेने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की इच्छाशक्ति राज्य व राजनीतिक दल दिखाएं। उद्यमिता को बढ़ाने पर अधिक जोर होना चाहिए। इसके लिए वातावरण सृजन भी आवश्यक है। दृढ़ इच्छाशक्ति से ही यह संभव है। ऋण को जीएसडीपी के तीन प्रतिशत से ज्यादा न होने दिया जाए। आय के स्रोत बढ़ाए जाएं और मुफ्त की बंदरबांट वाले वादों से बचा जाए।

[अर्थशास्त्री एवं प्राचार्य, एसजीआरआर पीजी कालेज, देहरादून]

Edited By: Sanjay Pokhriyal