जागरण विमर्श: भविष्य के लिए उम्मीद की आसान राह सुझाता है बजट
प्रो. आरपी ममगाईं ने उत्तराखंड के 1.11 लाख करोड़ के बजट 2026-27 का विश्लेषण किया।

दैनिक जागरण के राज्यस्तरीय अकादमिक विमर्श में दून विश्वविद्यालय के प्रो. आरपी ममगाईं ने प्रदेश के बजट के प्रमुख पहलुओं को समझाया।

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सुमन सेमवाल, देहरादून। उत्तराखंड सरकार की ओर से वर्ष 2026-27 के लिए पेश किए गए करीब 1.11 लाख करोड़ के बजट में प्रदेश के विकास की संकल्पना स्पष्ट नजर आती है।
बाहर से देखने मे बजट जितना आसान है, इसके विभिन्न पहलू उतने ही जटिल एवं गूढ़ नजर आते हैं।
बजट में किए गए प्रविधान भविष्य के लिए उम्मीद की आसान तस्वीर दिखाते हैं। सामने दिख रही विकास की तस्वीर को धरातल पर कैसे साकार किया जा सकता है और इसके क्या-क्या पहलू होते हैं, इस पर से दून विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. आरपी ममगाईं ने पर्दा उठाया।
दैनिक जागरण के राज्यस्तरीय अकादमिक विमर्श में बतौर विशेषज्ञ वक्ता प्रतिभाग करते हुए प्रो. ममगाईं ने उत्तराखंड के बजट के प्रमुख पहलुओं को शामिल कर विस्तृत जानकारी दी।
प्रो. ममगाईं ने कहा कि बजट का आकार और प्रविधान यह बताते हैं कि राज्य सरकार का फोकस कहां है।
करीब 1.11 लाख करोड़ रुपये के बजट में सेक्टरवार हिस्सेदारी से सरकार अपने फोकस एरिया को बताती है। साथ ही यह दर्शाती है कि बजट का 37 प्रतिशत हिस्सा वेतन और पेंशन पर ही खर्च हो जाता है।
इसके साथ ही नौ से 10 प्रतिशत भाग ब्याज और अन्य देनदारियों में चला जाता है। बाकी जो बचता है, सरकार उसे राज्य के विकास में खर्च करती है।
बजट में सकारात्मक बात यह नजर आती है कि सरकार करों के रूप में अपनी प्राप्तियों को बढ़ाकर 29 प्रतिशत पर ले आई है।
कर राजस्व में सुधार के बूते हम उन गिने-चुने राज्यों में शामिल हैं, जो राजस्व सरप्लस में हैं। इसका आशय यह हुआ कि जितनी प्राप्तियां हो रही हैं, उसी में खर्च पूरा हो रहा है और कोई राजस्व घाटा नहीं हो रहा।
कम करनी होगी केंद्र पर से निर्भरता
हमें बजट के एक पहलू के रूप में यह समझने की भी जरूरत है कि प्राप्तियों में 40 प्रतिशत केंद्र से आता है।
इसे सामान्य से अधिक माना जा सकता है और राज्य को आत्मनिर्भरता की तरफ तेजी से कदम बढ़ाते हुए इस निर्भरता को कम करना चाहिए। कर और करेत्तर राजस्व में सुधार लाकर इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
गैर कर श्रोतों को कर में परिवर्तित कर राज्य की राह आसान हो सकती है। दूसरी तरफ बजट को राजकोषीय घाटे के रूप में भी देखना चाहिए। हालांकि, यह जीएसडीपी के तीन प्रतिशत की मानक सीमा के अंतर्गत है।
फिर भी इसमें ऋण देनदारियों को शामिल करते हुए प्राथमिक घाटे के रूप में देखा जाए तो सुधार की गुंजाइश नजर आती है। दूसरी तरफ प्रो. ममगाईं ने सभी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वित्तीय अनुशासन पर खासा बल दिया।
पूंजीगत व्यय में बढ़ोतरी दर्शा रही दूरगामी सोच
अर्थशास्त्री प्रो. ममगाईं ने बताया कि राज्य सरकार दूरगामी परिणाम वाले कार्यों के रूप में पूंजीगत व्यय बढ़ा रही है।
यह किसी भी प्रदेश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए आवश्यक है। इसके परिणाम तत्काल नजर नहीं आएंगे।
कुछ वर्षों में सरकार की यह मंशा धरातल पर फल देने लगेगी। ऊर्जा, अनुसंधान एवं विकास व बागवानी जैसे सेक्टर इस बात के सूचक बनेंगे।
जेंडर बजट में बूम महिला सशक्तिकरण की बनेगा मिसाल
प्रो. ममगाईं ने कहा कि जेंडर बजट में सरकार ने 17.6 प्रतिशत की दर से 20 हजार करोड़ रुपये का प्रविधान किया है। यह महिला सशक्तीकरण की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कृषि और ग्रामीण विकास में भी सरकार ध्यान केंद्रित कर रही है।
प्रमुख सेक्टरवार बजट की स्थिति
- शिक्षा : करीब 13 हजार 201 करोड़ (12 प्रतिशत), बजट में बढ़ोतरी नहीं।
- स्वास्थ्य : कुछ वर्षों से कुल बजट का चार से पांच प्रतिशत, अतिरिक्त बूस्टर डोज नहीं।
- पर्यटन : जएसडीपी में 13 प्रतिशत हिस्सेदारी, मगर बजट में 0.46 प्रतिशत हिस्से के रूप में 514 करोड़ मिले।
वित्तीय अनुशासन की कमी
प्रो. ममगाईं ने कहा कि बजटीय प्रविधान से कम या अधिक खर्च वित्तीय अनुशासन की कमी को दर्शाता है। उन्होंने इस संबंध में कुछ विभागों-योजनाओं के उदाहरण भी रखे।
एससी-एसटी कल्याण : 43 प्रतिशत शेष रहे
- ऊर्जा : 43 प्रतिशत शेष रहे
- कृषि : 27 प्रतिशत शेष रहे
- ग्रामीण विकास : 23 प्रतिशत शेष रहे
- शहरी विकास : 10 प्रतिशत शेष रहे
- सिंचाई : 33 प्रतिशत शेष रहे
- पेयजल : कुल बजट का 135 प्रतिशत खर्च
- स्वास्थ्य : कुल बजट का 104 प्रतिशत खर्च
