देहरादून, जेएनएन। हिमालयन इंस्टीट्यूट हॉस्पिटल ट्रस्ट (एचआइएचटी) के संस्थापक डॉ. स्वामी राम के समाधि दिवस पर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई। श्री भारत माता मंदिर के संस्थापक स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी महाराज को मरणोपरांत स्वामी राम मानवता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एसआरएचयू के कुलपति डॉ. विजय धस्माना ने उनके शिष्य जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज को यह पुरस्कार प्रदान किया।

मेडिकल कॉलेज स्थित सभागार में आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस वर्ष का स्वामी राम मानवता पुरस्कार की स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी को प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उनके शिष्य आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज ने ग्रहण किया। पुरस्कार में सम्मान पत्र, गोल्ड मेडल और पांच लाख रुपये की नकद पुरस्कार राशि प्रदान की गई। 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहा कि हरिद्वार में भारत माता मंदिर बनाकर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी महाराज ने भारत माता के प्रति समर्पण का भाव प्रकट किया था। उन्हें यह पुरस्कार दिया जाना हमारे लिए गौरव की बात है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि गंगोत्री के बाद ऋषिकेश से गंगासागर तक जितना भी भूभाग है, दुनिया का सर्वाधिक उर्वरा भूभाग है।

गंगा जमुना न होती तो उत्तर भारत रेगिस्तान में बदल गया होता। इसी कारण उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पूरे देश का पेट भरने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि हिमालय में गढ़वाल के छोटे से गांव में जन्मे स्वामी राम ने देश और दुनिया को अध्यात्म की राह दिखाई। भारत की यह आध्यात्मिक शक्ति ही है जो पूरी दुनिया को एक कुटुंब के रूप में देखती है। 

संत समाज का सम्मान

आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज ने कहा कि ब्रह्मलीन संत स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी को यह सम्मान दिया जाना संत समाज का सम्मान है। उनके समाधि दिवस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सानिध्य मिलना सभी के लिए सम्मान की बात है। 

जन सेवा को समर्पित रहा डॉ. स्वामी राम का जीवन 

डॉ. स्वामी राम को लोग एक संत, समाजसेवी, चिकित्सक और लेखक के रूप में जानते हैं। लेकिन इन सबसे इतर दुनिया उन्हें मानव सेवा के संदेश वाहक के रूप में भी जाना जाता है। वर्ष 1925 में पौड़ी जनपद के तोली गांव में स्वामी राम का जन्म हुआ। किशोरावस्था में ही स्वामी राम ने संन्यास की दीक्षा ली। 13 वर्ष की अल्पायु में ही विभिन्न धार्मिक स्थलों और मठों में हिंदू और बौद्ध धर्म की शिक्षा देना शुरू किया।

24 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रयाग, वाराणसी और लंदन से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद कारवीर पीठ के शंकराचार्य पद को सुशोभित किया। गुरु के आदेश पर पश्चिम सभ्यता को योग और ध्यान का मंत्र देने 1969 में अमेरिका पहुंचे। 1970 में अमेरिका में उन्होंने कुछ ऐसे परीक्षणों में भाग लिया, जिनसे शरीर और मन से संबंधित चिकित्सा विज्ञान के सिद्धांतों को मान्यता मिली। उनके इस शोध को 1973 में इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका ईयर बुक ऑफ साइंस व नेचर साइंस एनुअल और 1974 में वर्ल्ड बुक साइंस एनुअल में प्रकाशित किया गया। 

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स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम उत्तराखंड में विश्व स्तरीय चिकित्सा संस्थान बनाने का स्वामी राम ने सपना देखा था। उन्होंने अपने सपने को आकार देना शुरू किया 1989 में। इसी साल उन्होंने गढ़वाल हिमालय की घाटी में हिमालयन इंस्टीट्यूट हॉस्पिटल ट्रस्ट की स्थापना की। ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के मकसद से 1990 में रुरल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (आरडीआइ) व 1994 में हिमालयन अस्पताल की स्थापना की। प्रदेश में डॉक्टरों की कमी को महसूस करते हुए स्वामी राम ने 1995 में मेडिकल कॉलेज की स्थापना की। नवंबर 1996 में स्वामी राम ब्रह्मलीन हो गए। 

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Posted By: Raksha Panthari

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