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उत्तराखंड यूसीसी: जनजातीय विवाह पंजीकरण की चुनौतियों का समाधान तलाशेगी सरकार

Published: Tue, 28 Jul 2026 10:44 PM (IST)

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद जनजातीय समुदाय के विवाह पंजीकरण में दिक्कतें आ रही हैं, क्योंकि उन्हें यूसीसी से छूट मिली है।

सांकेतिक तस्वीर।

सांकेतिक तस्वीर।

HighLights

  1. यूसीसी से जनजातीय समुदाय के विवाह पंजीकरण में आ रही है दिक्कत

  2. पासपोर्ट, वीजा, बैंकिंग जैसे कार्यों में दस्तावेजी समस्याएँ

  3. सरकार, विधि विभाग, आयोग मिलकर समाधान पर कर रहे विचार

राज्य ब्यूरो, देहरादून। उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू होने के बाद अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदाय के विवाह प्रमाणपत्र का मुद्दा सरकार के सामने नई चुनौती बनकर उभरा है।

यूसीसी के दायरे से बाहर होने के कारण जनजातीय समुदाय के अंतर्गत विवाह का पंजीकरण नहीं हो पा रहा है, जिससे पासपोर्ट, वीजा, बैंकिंग और अन्य सरकारी प्रक्रियाओं में उन्हें दस्तावेजी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

इस समस्या के समाधान के लिए अब गृह विभाग, विधि विभाग और अनुसूचित जनजाति आयोग संयुक्त रूप से रास्ता तलाशने में जुट गए हैं।

प्रदेश में 27 जनवरी, 2025 से लागू यूसीसी के तहत विवाह पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। यद्यपि, संविधान में जनजातीय समुदायों को प्राप्त विशेष संरक्षण को ध्यान में रखते हुए उन्हें इसके दायरे से बाहर रखा गया है। इसका व्यावहारिक असर अब सामने आने लगा है।

जनजातीय समुदाय को यूसीसी में छूट मिलने के कारण इन्हें विवाह पंजीकरण करने में काफी परेशानी हो रही है। इससे नव दंपति के पास विवाह का कोई आधिकारिक प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

इसके असर यह हो रहा है कि विभिन्न सरकारी दस्तावेजी प्रक्रियाओं में उन्हें कठिनाइयाें का सामना करना पड़ रहा है।

अनुसूचित जनजाति आयोग ने इस स्थिति को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से नियमों में आवश्यक ढील देने अथवा वैकल्पिक व्यवस्था विकसित करने का अनुरोध किया है।

इस क्रम में शासन स्तर पर कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं, इसमें कुछ विधिक समस्याएं सामने आ रही हैं।

इसे देखते हुए अब गृह विभाग कुछ नए प्रस्तावों के साथ विधि विभाग और अनुसूचित जनजाति आयोग के अधिकारियों के साथ बैठक करेगा।

बैठक में ऐसे कानूनी विकल्पों पर विचार किया जाएगा, जिनसे जनजातीय समुदाय के लोगों को विवाह का वैध दस्तावेज उपलब्ध कराया जा सके, जबकि उनकी पारंपरिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकार भी प्रभावित न हों।

सचिव गृह शैलेश बगौली का कहना है कि इस प्रकरण में कुछ विधिक समस्याएं सामने आ रही हैं, इन्हें दूर करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है।

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