देहरादून, राज्य ब्यूरो। वृक्ष जलवायु को स्वच्छ रखने और सांस लेने के लिए ऑक्सीजन देने का काम तो करते ही हैं, लेकिन अब ये किसानों की आर्थिकी मजबूत करने का भी काम कर रहे हैं। प्रदेश में पौधों की तकरीबन 26 प्रजातियां ऐसी हैं, जिनके रोपण के बाद परिपक्व होने पर काटने के लिए वन विभाग से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। ऐसे पेड़ किसानों को खेती के अतिरिक्त भी आय देने का माध्यम बन रहे हैं।

उत्तराखंड में पर्वतीय और तराई क्षेत्रों में पेड़ों की अलग-अलग प्रजातियां पाई जाती हैं। इनसे काष्ठ के सामान बनाए जाते हैं। हालांकि, इनमें से अधिकांश ऐसे पेड़ हैं जिन्हें काटने से पहले वन विभाग की अनुमति लेनी पड़ती है। ऐसे में इन वृक्षों को लोग अपने खेतों में लगाने से परहेज करते हैं। वन विभाग ने वृक्षारोपण को बढ़ावा देने और वन संपदा से किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए एक योजना बनाई। इसमें 27 ऐसे पेड़ों की प्रजातियों को शामिल किया गया, जिन्हें काटने के लिए विभाग की अनुमति न लेनी पड़े और इससे किसानों की अच्छी आय भी हो सके। ऐसे पेड़ों की पौध को फसल के रूप में खेतों में लगाया जा सकता है।

केंद्र और प्रदेश में सरकार इस समय किसानों की आय को दोगुना करने का प्रयास कर रही है। इसमें ऐसे पेड़ महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। प्रदेश के तराई और भाबर क्षेत्रों में पॉपलर और यूकेलिप्टस की खेती की जाती है। इन पेड़ों को मेढ़ों में लगाने के साथ ही खेतों में लगाया जाता है। इनका उपयोग प्लाइवुड आदि के काम में होता है। कुछ ही सालों में ये तैयार हो जाते हैं। वहीं, पर्वतीय क्षेत्रों की बात करें तो यहां भीमल, शहतूत, प्लास, उतीस, पेपर मलबरी आदि ऐसे पेड़ हैं, जिन्हें खेतों और मेढ़ों में उगाया जाता है।

इनके रेशों से रस्सियां बनाई जाती हैं तो लकड़ी का उपयोग काष्ठ का सामान बनाने में प्रयोग किया जाता है। उत्तराखंड में वन पंचायतों में भी वर्तमान में इन प्रजातियों के पौधों के रोपण पर जोर दिया जा रहा है। अगर सरकार इन पेड़ों की उपयोगिता के अनुसार इनके लिए बाजार उपलब्ध कराने का गंभीर प्रयास करे तो यह किसानों की आर्थिकी को और मजबूत कर सकते हैं।

ये हैं इस तरह के वृक्षों की प्रजातियां

अगस्तृ, अरू, उतीस, कैजूरिना, जंगल जलेबी, पॉपलर, फराद, बकेन, बबूल, विलायती बबूल, यूकेलिप्टस, रोबिनिया, कवाटेल, बिली, सिरिस, सुबबूल, अयार, कठवेर, खटिक, ढाक या प्लास, पेपर मलबरी, बेर, भिमल बाकुला, मेहल, सेंजना और शहतूत।

गांव में आबाद हो रही पर्यावरण की संस्कृति

पर्यावरण संरक्षण की मूल कड़ी पौधरोपण और उसके संरक्षण को लेकर पहाड़ के शहर और कस्बे गांव की तुलना में फिसड्डी हैं। गांव आज भी पर्यावरण संरक्षण को लेकर सजग प्रहरी के रूप में हैं, जबकि शहरों में कंक्रीट के जंगल खड़े करने की होड़ लगी हुई है।

उत्तरकाशी से लेकर पुरोला और मोरी तक की गई पड़ताल में ये तथ्य सामने आए हैं। शहरीकरण के साथ लोग प्रकृति से दूर हो रहे हैं। यही नहीं, पर्यावरण संरक्षण की पुश्तैनी संस्कृति से भी भावी पीढ़ी वंचित हो रही है, जिस संस्कृति में एक पेड़ दस पुत्रों के समान माना जाता है और पेड़ों की पूजा होती है। उत्तरकाशी जिला मुख्यालय, नौगांव, पुरोला, मोरी और चिन्यालीसौड़ के शहरी और ग्रामीणों से पौधरोपण करने के सवाल पूछे गए। शहरी क्षेत्र में रहने वालों का तर्क था कि उनके पास समय का अभाव है।

यह भी पढ़ें: युवाओं को नहीं पौधारोपण के महत्व का भान, बुजुर्ग संभाले हुए हैं कमान

शहरी क्षेत्र की महिलाओं ने अपने घर-आंगन में किचन गार्डन बनाए हैं, लेकिन अधिकांश महिलाएं अपने दैनिक दिनचर्या के कार्य में ही व्यस्त रहती हैं। अधिकांश व्यापारी और कर्मचारी भी ऐसे हैं, जिन्होंने बचपन में स्कूलिंग के दौरान पौधरोपण कार्यक्रमों में शामिल हुए। शहरों में कुछेक संस्थाएं हैं, जो हर बार पौधरोपण के कार्यक्रम आयोजित कराती हैं, जबकि ग्रामीण परिवेश में महिलाएं पौधरोपण और उनके संरक्षण को लेकर आगे हैं।

यह भी पढ़ें: उत्तराखंड में हरियाली के लिहाज से कुछ सुकून, तो चिंताएं भी बढ़ीं; जानिए

इंडियन टी20 लीग

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस