देहरादून, राज्य ब्यूरो। दो साल पहले खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) हो चुके उत्तराखंड में अभी भी लगभग 13 हजार शौचालयों के बनने का इंतजार है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के इन शौचालयों में से 5906 के लिए धनराशि जिलों को जारी हो चुकी है। अलबत्ता, शहरी क्षेत्र के 7015 आवेदनों पर निर्णय होना बाकी है। हालांकि, 2012 के बेस लाइन सर्वे के आधार पर राज्य ओडीएफ मुक्त हो चुका है, मगर नए घरों का निर्माण भी निरंतर हो रहा है। ऐसे में शौचालयों की मांग बढऩा स्वाभाविक है। इस परिदृश्य के बीच राज्य के ओडीएफ के रुतबे को बरकरार रखने की चुनौती है।

स्वच्छ भारत मिशन के तहत उत्तराखंड के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वर्ष 2014-15 में मुहिम शुरू की गई। इसके लिए स्वच्छ भारत मिशन-शहरी विंग के लिए शहरी विकास विभाग और स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के लिए स्वजल को नोडल बनाया गया। राज्य को खुले में शौच से मुक्त यानी ओडीएफ के लिए तब 2012 के बेसलाइन सर्वे को आधार बनाया गया। इसके आधार पर व्यक्तिगत घरेलू शौचालय, कम्युनिटी व पब्लिक शौचालय, मूत्रालयों की मुहिम प्रारंभ की गई।

पहले बात स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण की। 2012 के बेसलाइन सर्वे के अनुसार तब ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की संख्या 1551416 थी, जिनमें से 67.14 फीसद के पास शौचालय थे। शेष 509830 परिवार ऐसे थे, जिनके पास अपने घरेलू शौचालय नहीं थे। इन परिवारों को शौचालय मुहैया कराने की मुहिम चली और फिर लक्ष्य से अधिक 590077 परिवारों के शौचालय बनाए गए।

फिर जून 2017 में प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों को खुले में शौच की प्रथा से मुक्त घोषित किया गया। इस बीच ये बात सामने आई कि ओडीएफ होने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परिवारों के पास शौचालय नहीं हैं। ये वह परिवार थे, जो 2012 के बेसलाइन सर्वे में शामिल नहीं हो पाए थे। 2018 में जिला स्तर पर रैपिड सर्वे हुआ तो ऐसे छूटे हुए परिवारों की संख्या 39060 पाई गई। केंद्र सरकार ने इन परिवारों को शौचालय सुविधा मुहैया कराने को वित्तीय स्वीकृति दी गई।

स्वजल के अपर निदेशक डीआर जोशी बताते हैं कि अब तक छूटे हुए परिवारों के सापेक्ष 34504 शौचालय पूर्ण हो चुके हैं। शेष 4556 परिवारों के शौचालयों के लिए बजट जारी हो चुका है। मार्च तक ये लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा।

इधर, 90 शहरों में चल रही मुहिम के तहत 2014 से अब तक व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों के निर्माण को 28265 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से 21250 शौचालयों को मंजूरी दी गई, जिनमें से 19900 का निर्माण पूरा हो चुका है। शेष 1350 पर कार्य चल रहा है और ये भी जल्द पूरे हो जाएंगे। इस बीच 2018 में शहरी क्षेत्रों के साथ ही संपूर्ण राज्य ओडीएफ घोषित कर दिया गया।

स्वच्छ भारत मिशन-शहरी के स्टेट मिशन मैनेजर रवि बिष्ट के मुताबिक शेष 7015 आवेदनों की पड़ताल चल रही है। जल्द ही इनके संबंध में निर्णय लिया जाएगा। उनके मुताबिक जिन क्षेत्रों में लोगों के पास शौचालय के लिए भूमि नहीं है, वहां 1963 सीट के सामुदायिक व पब्लिक टॉयलेट स्वीकृत किए गए हैं। इन पर कार्य चल रहा है। इसके अलावा विभिन्न संस्थाओं व कंपनियों के सहयोग से 3700 शौचालय भी पृथक से बनवाए गए हैं।

पांच साल में 723 करोड़ खर्च

उत्तराखंड को ओडीएफ बनाने के लिए  पांच साल में 729 करोड़ की राशि शौचालयों के निर्माण में खर्च हो चुकी है। इसमें 672 करोड़ ग्रामीण क्षेत्रों में और 48.9 करोड़ रुपए शहरी क्षेत्रों में व्यय हुए। इस राशि से राज्यभर में 644481 व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण कराया गया है। बावजूद इसके शौचालयों की मांग अभी भी निरंतर आ रही है। इसे पूरा करना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

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यह है प्रक्रिया

किसी भी क्षेत्र में शत-प्रतिशत शौचालयों का आच्छादन होने के बाद संबंधित निकाय व पंचायत खुद को ओडीएफ घोषित करते हैं। इसके लिए उन्हें शत-प्रतिशत शौचालयों के फोटो मिशन की साइट पर अपलोड करने होते हैं। फिर मिशन से मॉनीटङ्क्षरग होती है। साथ ही थर्ड पार्टी मॉनीटङ्क्षरग भी की जाती है और कमियों को दूर कराकर प्रस्ताव शासन में टीएसी के लिए भेजा जाता है। टीएसी से पास होने के बाद मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य स्तरीय हाईपावर कमेटी अनुमोदन के बाद केंद्र को प्रस्ताव भेजती है। फिर केंद्र सरकार की टीम सबंधित क्षेत्र का भौतिक सत्यापन करती है और तब जाकर ओडीएफ की घोषणा होती है।

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Posted By: Sunil Negi

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