केदार दत्त, देहरादून। वह जंगल का सुल्तान है और उसे किसी प्रकार का बंधन पसंद नहीं है। यूं कहें कि स्वच्छंदता में बाधा उसकी शान के खिलाफ है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। चलिये पहेली बहुत हो गई, इसे बुझाये देते हैं। दरअसल, सुल्तान उस बाघ का नाम है, जिसे बीती नौ जनवरी को कार्बेट से राजाजी टाइगर रिजर्व के मोतीचूर-धौलखंड क्षेत्र में शिफ्ट किया गया। कार्बेट से सुल्तान को यहां लाने से पहले उसे रेडियो कॉलर पहनाया गया, ताकि उसकी निगरानी में आसानी हो। मोतीचूर पहुंचकर जब उसे बाड़े में रखा गया तो गले में पड़े बंधन रूपी रेडियो कॉलर को उसने कब उतार फेंका और कब वह जंगल में चला गया, इसका पता ही नहीं चला। शुक्र यह कि अगले दिन जंगल में लगे कैमरा ट्रैप में उसकी तस्वीर कैद हो गई। तब जाकर जंगल के रखवालों की सांस में सांस आई। हालांकि, अब उसकी निगरानी को चौकसी बढ़ा दी गई है।

कार्बेट में मोबाइल फोन प्रतिबंधित

जंगल सफारी के दौरान सैलानियों के साथ ही वन्यजीवों की सुरक्षा जरूरी है तो पारिस्थितिकीय तंत्र को नुकसान न पहुंचे यह भी सभी का दायित्व है। इसी दायित्व का बोध कराने को कार्बेट टाइगर रिजर्व की पहल को सराहा जाना चाहिए। रिजर्व प्रशासन ने अब गाइड और जिप्सी चालकों के सफारी के दौरान मोबाइल ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। सैलानियों के लिए भी गाइडलाइन जारी की है कि वे अपने साथ कोई खाद्य सामग्री नहीं ले जाएंगे। वे सिर्फ पानी की बोतल ही ले जा सकेंगे, जिसे वापसी में जमा करना होगा। दरअसल, पूर्व में कई बार ये बातें सामने आई हैं कि गाइड अथवा जिप्सी चालक सफारी के दौरान मोबाइल पर बतियाते हैं, जो सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है। इसी तरह सैलानियों द्वारा जंगल में छोड़ी जाने वाली प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य सामग्री के रैपर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। इस सब पर अंकुश जरूरी है।

यहां क्यों नहीं आते सैलानी

छह राष्ट्रीय उद्यान, सात अभयारण्य और चार कंजर्वेशन रिजर्व वाले उत्तराखंड में वन्यजीव पर्यटन का दारोमदार कार्बेट और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान पर ही टिका है। आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। यदि राज्य में साढ़े तीन लाख सैलानी प्रतिवर्ष वन्यजीव पर्यटन को आते हैं तो दो से ढाई लाख की पसंद कार्बेट, राजाजी होते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि वन्यजीव पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज राज्य के दूसरे राष्ट्रीय उद्यानों से सैलानियों की दूरी क्यों। साफ है कि जैसी सुविधाएं कार्बेट व राजाजी और इनके इर्द-गिर्द विकसित की गई हैं, वैसी नंधौर अभयारण्य अथवा नंदादेवी बायोस्फीयर रिजर्व के आसपास नहीं है। यदि ऐसा होता तो सैलानी वहां जाना अधिक पसंद करते। अब जबकि कोरोनाकाल के बाद परिस्थतियां बदली हैं तो इस मसले पर भी ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। उच्च हिमालयी क्षेत्र के संरक्षित क्षेत्रों में वन्यजीव पर्यटन बढ़ेगा तो रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

रोजगारपरक नीतियों, कार्यक्रमों की समीक्षा

वानिकी, वन्यजीव और पर्यावरण उत्तराखंड को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाते हैं। जाहिर है कि 71.05 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में इन तीनों ही सेक्टरों में आजीविका और रोजगार की भी उम्मीद अधिक की जाती है। बावजूद इसके तस्वीर एकदम उलट है। हालांकि, वानिकी, वन्यजीव और पर्यावरण के क्षेत्र में तमाम नीतियां व कार्यक्रम जरूर बने हैं, लेकिन कितने लोग आजीविका से जुड़े और कितनों को रोजगार मिला, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा ही नहीं है। वजह ये कि इन नीतियों और कार्यक्रमों की समीक्षा की जहमत नहीं उठाई गई। लंबे इंतजार के बाद अब इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। हेड आफ फारेस्ट फोर्स की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई है, जो इन नीतियों व कार्यक्रमों के संदर्भ में पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपेगी। इसके बाद ही आजीविका व रोजगार को लेकर असल तस्वीर सामने आ सकेगी। इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।

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