देहरादून, विजय जोशी। डीएवी पीजी कॉलेज समेत अन्य महाविद्यालयों के छात्रसंघ चुनाव इस बार ठंडे बस्ते में चले गए हैं। बात करें डीएवी कॉलेज की तो करीब दस हजार से अधिक छात्र संख्या वाले इस महाविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव उत्सव की तरह होता है, लेकिन कोरोना के प्रकोप ने इस पर ग्रहण लगा दिया। हर बार जुलाई में कॉलेज का सत्र शुरू होते ही यहां तमाम छात्र संगठन चुनावी तैयारियों में जुट जाते थे। इस बार कॉलेज बंद हैं और छात्र घरों में। ऐसे में छात्रसंघ चुनाव की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही है। दरअसल, डीएवी पीजी कॉलेज में छात्र एक से दो साल पहले ही चुनाव की तैयारी में जुट जाते हैं। वहीं एनएसयूआइ और एबीवीपी से जुड़े छात्र नेता भी चुनावी तैयारियों में जुटे रहते हैं, मगर इस बार कोरोना संक्रमण के चलते उनकी सभी तैयारियां धरी रह गई हैं। छात्र नेता अब छात्रों से व्यक्तिगत मेल-मिलाप बढ़ा रहे हैं। 

अविष्कार का अवसर

तकनीकी क्षेत्र में नौकरी करने वालों के लिए कोरोना महामारी को अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है। भले ही इस समय कॉलेज बंद हैं और नौकरियों पर भी असर पड़ा है, लेकिन युवाओं के पास अपनी प्रतिभा को निखारने और दुनिया को उससे रूबरू कराने का भी यही समय है। दून के कुछ युवा ऐसा कर भी रहे हैं। वे घर में रहकर आविष्कार करने में जुटे हैं। हाल ही में दून के अभिलाष सेमवाल ने कोरोना की रोकथाम को नवाचार का परिचय दिया। अभिलाष ने ऐसा जैकेट बनाया, जो शारीरिक दूरी नियम का पालन कराता है। यह जैकेट किसी के ज्यादा करीब आने पर अलार्म बजा देता है और आपको दूरी बनाने को आगाह कर देता है। वहीं, दून के ही एक युवा रजत जैन ने भी ऑटोमैटिक वेंटिलेटर बनाया है। कुछ अन्य युवा भी सैनिटाइजर स्टैंड और नए तरीके के मास्क आदि बना रहे हैं।

भर्तियों पर संकट

उत्तराखंड को वीरों की भूमि है। यहां सेना में सेवा देने वालों की संख्या काफी अधिक है। हालांकि, इस साल उत्तराखंड में एक भी सेना भर्ती का आयोजन नहीं किया जा सका है। जबकि, पर्वतीय जिलों के करीब 40 फीसद युवा सेना भर्ती की तैयारी में जुटे हैं। इनमें कई ऐसे भी हैं, जो कोरोना काल में आयु सीमा को पार कर चुके हैं और सेना में भर्ती होने का उनका ख्वाब टूट गया है। जबकि, कई युवा अब भी तैयारी में जुटे हैं और शीतकाल तक भर्तियों के आयोजन की आस लगाए हैं। अब हालात ठीक हुए तो अक्टूबर के बाद प्रदेश में भर्तियां हो सकती हैं, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है। ऐसे में पर्वतीय क्षेत्र के युवाओं के सामने कॅरियर को लेकर चिंता और बढ़ गई है। फिर भी उम्मीद है कि जल्द कोरोना का संकट टलेगा और सेना में नई भर्तियों के रास्ते भी खुल जाएंगे। 

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स्कूलों पर संशय

कोरोना महामारी स्कूली बच्चों के लिए मुसीबत बन गई है। स्कूल बंद हैं और ऑनलाइन क्लास ही एक मात्र सहारा है। हालांकि, इससे मोबाइल और लैपटॉप पर निगाहें गड़ाए छात्रों की आंखों पर बुरा असर पड़ रहा है। वर्चुअल क्लास को इतना कारगर भी नहीं कहा जा सकता। स्कूलों के खुलने का छात्र भी इंतजार कर रहे हैं, लेकिन कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों को देखकर फिलहाल यह संभव नहीं लग रहा है। केंद्र सरकार की ओर से जल्द में स्कूल खोलने के संकेत तो मिले हैं, लेकिन इसकी अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। वैसे भी स्कूली बच्चों को कोरोना से बचाव की गाइडलाइन शत-फीसद फॉलो कराना इतना आसान नहीं होगा। देखा जाए तो स्कूलों में ही छात्रों को पढ़ाई का वातावरण मिलता है और पढ़ाई के साथ-साथ वे अन्य गतिविधियों में भी शामिल होते हैं। फिलहाल तो स्कूलों खुलने को लेकर संशय ही बना हुआ है। 

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