उत्तराखंड के चकराता का दुर्लभ मेंढक 41 साल से लापता, हिमालयी पारिस्थितिकी पर मंडराया खतरा
उत्तराखंड के चकराता में 41 साल से दुर्लभ चकराता टोरेंट फ्राग नहीं दिखा, जिससे उसके स्थानीय रूप से विलुप्त होने ...और पढ़ें

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HighLights
चकराता टोरेंट फ्राग 41 साल से अपने आवास में लापता
व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षण में प्रजाति का कोई सदस्य नहीं मिला
प्रदूषण, निर्माण और वन कटाई से आवास को खतरा
जागरण संवाददाता, देहरादून। उत्तराखंड के चकराता की पहाड़ियों में कभी तेज बहाव वाली जलधाराओं के किनारे दिखाई देने वाला एक दुर्लभ मेंढक अब विज्ञानियों के लिए रहस्य बन गया है।
चकराता टोरेंट फ्राग (अमोलोपस चकराताएंसिस) नाम की यह प्रजाति वर्ष 1985 के बाद से अपने मूल आवास में नहीं देखी गई है।
हाल में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में इसके चकराता क्षेत्र से स्थानीय स्तर पर विलुप्त होने की आशंका जताई गई है।
इस अध्ययन को प्रतिष्ठित विज्ञानी पत्रिका जर्नल आफ थ्रेटेंड टैक्सा में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की विज्ञानी कुमुदनी बाला गौतम समेत एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के विज्ञानी देवेंद्र सिंह और अमित बडोला सहित अन्य शोधकर्ता शामिल रहे।
शोध के अनुसार यह मेंढक सामान्य तौर पर खेतों, तालाबों या बरसात के पानी में मिलने वाले मेंढकों जैसा नहीं है। यह केवल पहाड़ों में बहने वाली ठंडी, साफ और तेज धाराओं के आसपास रहता था।
यही वजह है कि इसे टोरेंट फ्राग यानी तेज बहाव वाली जलधाराओं का मेंढक कहा जाता है। विज्ञानियों के अनुसार इसकी मौजूदगी किसी जलधारा के स्वस्थ और स्वच्छ होने का संकेत मानी जाती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार इस प्रजाति का अंतिम पुष्ट रिकार्ड वर्ष 1985 का है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और अन्य विज्ञानियों की टीम ने वर्ष 2023 और 2024 में चकराता क्षेत्र की कई जलधाराओं और संभावित आवास स्थलों पर दिन और रात दोनों समय व्यापक सर्वेक्षण किया।
करीब 39 दिनों तक चले इस अभियान में शोधकर्ताओं ने मेंढकों की आवाज सुनने से लेकर चट्टानों और जलधाराओं के किनारों तक तलाश की, लेकिन इस प्रजाति का एक भी सदस्य नहीं मिला।
विज्ञानियों का मानना है कि पहाड़ी जलधाराओं में बढ़ता प्रदूषण, सड़कों और भवनों का निर्माण, जंगलों का क्षरण और प्राकृतिक जल स्रोतों के स्वरूप में बदलाव ने इस प्रजाति के आवास को प्रभावित किया है।
चूंकि यह मेंढक केवल साफ और तेज बहने वाले पानी में ही जीवित रह सकता था, इसलिए पर्यावरण में मामूली बदलाव भी इसके लिए बड़ा खतरा बन गया।
शोधकर्ताओं ने चकराता क्षेत्र की जलधाराओं और उनसे जुड़े प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता बताई है।
उनका मानना है कि यदि ऐसे संवेदनशील आवासों को नहीं बचाया गया तो पश्चिमी हिमालय की कई अन्य दुर्लभ प्रजातियां भी इसी तरह खतरे में पड़ सकती हैं।
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