जागरण संवाददाता, देहरादून: गांधी नेत्र चिकित्सालय के हालात जरूर बदलने लगे हैं पर चुनौतियां अभी भी कम नहीं है। अस्पताल बने करीब डेढ़ साल बीत चुके हैं पर अब तक न प्रबंधन समिति ही अस्तित्व में आई और न किसी को वित्तीय अधिकार ही दिए गए हैं। ऐसे में हर छोटी बड़ी जरूरत के लिए अस्पताल को स्वास्थ्य महानिदेशालय का मुंह ताकना पड़ता है। पंजीकरण शुल्क आदि के नाम पर जमा रकम में नियमानुसार अस्पताल पचास प्रतिशत खर्च कर सकता है। पर वह प्रबंधन समिति के माध्यम से होता है। यह फायदा भी अस्पताल को नहीं मिल रहा। उस पर अस्पताल को मिलने वाले सालाना बजट का भी इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक नहीं हो रहा है। ऐसे में तमाम तरह की दिक्कत आ रही है। ऐसा नहीं है कि विभाग व शासन को इस बात का आभास नहीं है, पर अधिकारी फिर भी मुंह फेरे बैठे हैं। इस कारण काम में बिना वजह का विघ्न उत्पन्न हो रहा है। सीवर का नहीं हुआ कनेक्शन अस्पताल में एक समस्या सीवर की भी है। यहां अभी तक भी सीवर कनेक्शन नहीं हुआ है। अब अस्पताल का संचालन सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल के रूप में होना है। जाहिर है कि मरीजों का दबाव भी बढ़ेगा। यहां डिलिवरी भी शुरू की जा रही है। ऐसे में सीवर का कनेक्शन न होने से दिक्कत आ सकती है। ठेकेदार की ली क्लास अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ.बीसी रमोला ने मंगलवार को अस्पताल में लेबर सप्लाई करने वाली फर्म की जमकर क्लास ली। दरअसल इस फर्म के माध्यम से अस्पताल में करीब बारह कर्मचारी रखे गए हैं। इनमें गार्ड और सफाई कर्मचारी शामिल हैं। आए दिन इन कर्मचारियों की शिकायतें अस्पताल प्रशासन को मिलती रहती हैं। मंगलवार को एमएस ने ठेकेदार को इन कमियों पर तलब किया था। उसे बताया कि इस लापरवाही से अस्पताल का काम प्रभावित हो रहा है। ठेकेदार से अस्पताल में मैनपॉवर बढ़ाने के लिए भी कहा गया। बता दें कि एक जुलाई से गाधी शताब्दी नेत्र चिकित्सालय के द्वितीय तल पर स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग पूरी तरह से काम करने लगेगा। ऐसे में यहा कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ाने की आवश्यकता है।

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