रविंद्र बड़थ्वाल, देहरादून। 2021 में दोहराया जा रहा है 2016। बात कुछ अटपटी लग सकती है। ये कारनामा कोई और नहीं सबसे बड़े महकमे शिक्षा का है। 2017 विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कांग्रेस सरकार ने प्रदेश में राजकीय प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को रंग-रोगन से चमकाकर माडल स्कूल का दर्जा दिया। हर ब्लाक में छांटे गए पांच स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने में सक्षम सरकारी शिक्षकों की खोजबीन शुरू की गई। चयन को नियम, गुणांक तय करने की पूरी मशक्कत हुई। 2016 के बचे-खुचे महीने बीत गए। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने वाले शिक्षकों की तलाश खत्म नहीं हो पाई। 2017 में आई भाजपा सरकार के कार्यकाल में माडल स्कूल योजना को भाव नहीं मिला। मौजूदा सरकार अटल उत्कृष्ट विद्यालय योजना को परवान चढ़ा रही है। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने वाले शिक्षक ढूंढे नहीं मिल रहे। 2021 में कुछ ही महीने बचे हुए हैं और 2022 आने वाला है।

ई-लर्निंग को खुली बजट पोटली

ई-लर्निंग मौजूदा दौर की शिक्षा व्यवस्था की बड़ी आवश्यकता है। कोरोना महामारी ने इस सच से सरकार को भी रूबरू करा दिया। प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों का लर्निंग अचीवमेंट लेवल बढ़ाने और उनकी समझ को विकसित करने में यह टूल अहम साबित हो रहा है। अब सरकार की सोच में बदलाव का असर बजट पर भी दिखाई दे रहा है। पहली बार जिला योजना मद की बजट राशि खर्च करने के लिए जो दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, उनमें ई-लर्निंग जैसी अवस्थापना सुविधाएं मजबूत करने के लिए 10 फीसद तक धनराशि खर्च करने की व्यवस्था की गई है। शिक्षा विभाग और स्कूलों को इससे बड़ी राहत मिलेगी। इस बजट में स्कूलों में शौचालयों की साफ-सफाई के लिए भी बजट रखा जा सकेगा। साफ-सफाई मद में बजट नहीं होने की वजह से बड़ी संख्या में स्कूलों में शौचालय ठप या खराब हो चुके हैं। समस्या का निदान अब हो सकेगा।

शिक्षक नहीं बने कोरोना वारियर

प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के बाद से शिक्षा विभाग खुलेपन का कुछ ज्यादा ही अहसास कर रहा है। खासतौर पर कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के तेजी से जोर मारने के बावजूद प्रदेश में स्कूलों को खोलने की पैरवी की जा रही है। बीता पूरा सत्र कोरोना के साये में गुजार चुके निजी स्कूल दोबारा स्कूलों पर ताले लटकने के अंदेशे से चिंतित हैं। कोरोना संक्रमण ने स्कूलों में दस्तक देनी शुरू कर दी है। केंद्रीय विद्यालयों के साथ प्रतिठति दून स्कूल में छात्र और शिक्षक कोरोना संक्रमित मिले हैं। बच्चों के लिए अभी तक कोरोना वैक्सीन ढूंढी नहीं जा सकी है। बढ़ते संकट के बीच सरकारी प्राथमिक स्कूलों को भी खोलने की कसरत चल रही है। विभाग ने माध्यमिक स्तर पर खोले गए स्कूलों के शिक्षकों को कोरोना वारियर का दर्जा दिलाने के प्रयास नहीं किए हैं। गांवों में पढ़ाने जाने वाले स्कूली शिक्षकों का वैक्सीनेशन होना ही चाहिए।

ब्रिज कोर्स से बच्चों को सहारा

प्रदेश में सरकारी स्कूलों के अपेक्षाकृत गरीब बच्चों पर कोरोना कहर बनकर टूटा है। सरकार की ओर से किए गए आकलन में यह सच भी सामने आया है कि कोरोना अवधि में स्कूल बंद होने की वजह से बड़ी संख्या में बच्चे ड्रापआउट हुए हैं। इन दिनों शिक्षा विभाग गृह परीक्षाएं करा रहा है। आनलाइन पढ़ाई के आधार पर कराई जा रही इस परीक्षा में छात्रसंख्या घटने की जानकारी मिलने से विभाग भी सहमा हुआ है। पढ़ाई से वंचित रहे बच्चों के लिए अब शिक्षा विभाग ने ब्रिज कोर्स तैयार किया है। अगली कक्षाओं में पदोन्नत किए जाने वाले विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई कराने से पहले तीन महीने में यह कोर्स कराया जाएगा। इसके लिए शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वर्चुअल लैब के माध्यम से अभी तक 2963 शिक्षकों, 2277 हेडमास्टरों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। बच्चों को सहारा देने की यह पहल स्वागतयोग्य है।

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