देहरादून, जेएनएन। दून में लॉकडाउन का चौथा दिन बीत गया। व्यवस्थाओं में कुछ सुधार जरूर दिखा, मगर यह कुछ स्थानों तक ही सीमित रहा। जिलाधिकारी के आदेश के बाद कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठानों ने चूने के घेरे बनाकर लोगों को अलग-अलग खड़े कराया, मगर अधिकतर स्थानों पर ऐसी स्थिति नहीं दिखी। लॉकडाउन में सुबह सात से 10 बजे तक तीन घंटे की ढील में अधिकतर लोग कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रति सजग नहीं दिख रहे। सोशल डिस्टेंसिंग का भी अभी पालन नहीं किया जा रहा। इतना जरूर है कि 10 बजे के बाद सड़कों पर लॉकडाउन का कुछ सख्ती से पालन जरूर कराया जा रहा। मगर, कोरोना का संक्रमण सुबह, दिन या शाम देखकर नहीं आता। सुबह के समय ही कोई व्यक्ति कोरोना से संक्रमित हो जाए तो फिर लॉकडाउन का मतलब ही क्या रह गया। इस तरह हर दिन सुबह और शाम कोरोना संक्रमण का खतरा बना ही है। लोग खुद इसे निमंत्रण दे रहे हैं और पुलिस-प्रशासन का ऐसी स्थिति पर प्रभावी नियंत्रण नहीं दिख रहा।

काल्पनिक भय से नहीं उबर पा रहे लोग

लॉकडाउन में तीन घंटे की ढील सिर्फ इसलिए दी गई है कि लोग जरूरत का सामान खरीद सकें। मगर, बाजार में उमड़ रही भीड़ बता रही है कि लोग जरूरत से कहीं अधिक सामान खरीद रहे हैं। यह सामान जरूरत की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि घर में स्टॉक जमा करने के लिए किया जा रहा है। इससे न सिर्फ कोरोना संक्रमण का खतरा कई गुना हो गया है, बल्कि इससे वस्तुओं के दाम भी अनावश्यक बढ़ रहे हैं। बाजार की मुनाफाखोरी पर प्रशासन का अंकुश नहीं दिख रहा, न ही अधिकारी भीड़ पर नियंत्रण कर पा रहे हैं। जिलाधिकारी बार-बार अपील दोहरा चुके हैं कि खाद्य सामग्री की जमाखोरी न करें। सभी वस्तुएं पर्याप्त मात्र में उपलब्ध हैं। मगर, इसका असर होता नहीं दिख रहा। बाजार में भेड़चाल कायम है और कोरोना का खतरा भी। खाद्य समाग्री बेशक मिलती रहेगी, सिर्फ लोगों को अपने मन से किसी काल्पनिक संकट का भय दूर करना होगा। यदि लोग नहीं मान रहे हैं तो कुछ सख्त व्यवस्था बनानी होगी।

घर बैठे अधिकारियों का कब होगा उपयोग

लॉकडाउन के बीच तमाम विभागों के अधिकारी घर में बैठे हैं। वर्क फ्रॉम होम (घर से काम) की व्यवस्था जरूर है, मगर कोई काम नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में इन अधिकारियों को कार्रवाई के समुचित अधिकार देकर तीन घंटे की ढील में लोगों को नियंत्रित करने के काम में लगाया जाना चाहिए। क्योंकि इस समय प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकता यही होनी चाहिए कि लॉकडाउन की व्यवस्था को हर हाल में लागू कराया जा सके। जिस क्षेत्र में कोई राजपत्रित अधिकारी निवास करते हैं, यदि उन्हें उसी क्षेत्र की दुकानों की जिम्मेदारी दे दी जाए तो भीड़ को नियंत्रित कर कोरोना संक्रमण के खतरे से बचाया जा सकता है। इसके लिए प्रशासन को अविलंब प्लान तैयार करना होगा। इसी तरह के उपायों से सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन कराना जा सकता है।

अतिरिक्त फोर्स उतारने का भी सही समय

इस समय लोग नियमों का पालन नहीं कर रहे। सुबह और शाम के वक्त गली-मोहल्लों का नजारा आम दिन जैसा दिख रहा है। ऐसे में पुलिसबल को शहर के अंदरूनी हिस्सों में भी गश्त करनी चाहिए। इसके अलावा सड़कों पर अतिरिक्त फोर्स भी तैनात करने की जरूरत है। यदि स्थानीय स्तर पर ऐसा नहीं हो पा रहा है तो फिर  कर्फ्यू ही एकमात्र विकल्प बचता है। इस विकल्प को भी अपनाने में इस समय गुरेज नहीं करना चाहिए। कोरोना वायरस की चेन को तोड़ने के लिए जितने प्रयास हों, सभी करने चाहिए। क्योंकि यदि हम समय रहते नहीं चेते तो पूरा सिस्टम घुटने टेकने की हालत में आ जाएगा। जो गलती शुरुआत में चीन, इटली, स्पेन जैसे देशों ने की, वह हमें कतई नहीं करनी चाहिए।

काम के बहाने मौज काट रहे लोगों पर अंकुश नहीं

आवश्यक सेवाओं के नाम पर सड़क पर निकलने की छूट की आड़ में कई कार्मिक मनमर्जी भी कर रहे हैं। पुलिस भी इनसे सरसरे तौर पर बात कर जाने दे रही है। होना यह चाहिए कि जिस भी आवश्यक सेवा कर्मी को काम के लिए छूट चाहिए, उससे यह पूछा जाए कि उसकी ड्यूटी किधर है। क्योंकि हो सकता है कि जिस तरफ कर्मी की ड्यूटी है, वह उसके विपरीत छोर की तरफ जा रहा है। प्रशासन ने ऐसे कार्मिकों के लिए पास की भी व्यवस्था की है। लिहाजा, उनके पास में घर व संबंधित कार्यस्थल के हिसाब से ही उसी रूट के लिए अनुमति प्रदान की जाए। इसी तरह अन्यत्र बेवजह घूम रहे लोगों पर अंकुश लग पाएगा।

कहां गए पार्षद और मोहल्ले के प्रतिनिधि

लॉकडाउन की ढील के समय में लोग भीड़ का हिस्सा न बनें, इसके लिए किसी भी स्तर पर ठोस पहल नहीं की जा रही। न तो प्रशासन के स्तर पर, न ही विभिन्न संगठनों के स्तर पर अपेक्षित शुरुआत की जा सकी है। कुछ संगठन जरूर आगे आने की पहल कर रहे हैं, मगर उन्हें प्रशासन की हामी और सहयोग की चेन में शामिल करने का इंतजार है। किसी क्षेत्र विशेष पर सबसे अधिक पकड़ा वहां के पार्षद, स्थानीय जनप्रतिनिधि, आवासीय समितियों के सदस्यों की होती है।

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यदि इन लोगों के उनके क्षेत्र की ही आवश्यक वस्तुओं की बिक्री का दुकानों की जिम्मेदारी देकर सोशल डिस्टेंसिंग के काम में लगा दिया जाएगा तो पूरी व्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। पर इसके लिए पहल करे तो कौन? प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा और प्रतिनिधिगण घर में बैठे हैं। इसके अलावा नागरिक सुरक्षा संगठन को भी फील्ड में उतारकर व्यवस्थाएं बनाई जा सकती हैं। यदि अधिकारी प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुरूप लॉकडाउन का बेहतर पालन कराना चाहते हैं तो ऐसे संगठनों का समुचित उपयोग हर हाल में किया जाना चाहिए।

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Posted By: Sunil Negi

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