देहरादून, अंकुर अग्रवाल। एक ओर तो प्राइवेट स्कूल संचालक फीस के नाम पर अभिभावकों को परेशान कर रहे हैं तो दूसरी ओर पूरा दिन उन्हें उस काम में फंसा दिया है, जो काम स्कूल के टीचरों का है। स्कूल बंद हैं और लगातार ऑनलाइन क्लास चल रहीं हैं। बच्चों का नई क्लास में एडमिशन भी ऑनलाइन हो चुका है। अभिभावकों को ऑनलाइन ही ये भी बता दिया है कि कौन क्लास टीचर व बच्चे का क्या सिलेबस है। सुबह-सवेरे मोबाइल पर ही हाजिरी लगती है और शुरू होती है, अभिभावकों की पूरे दिन की मुसीबत। नई क्लास के नए कोर्स बच्चे समझ नहीं पा रहे। मैडम सीधे असाइनमेंट डालकर उन्हें पूरा कराने का दबाव दे रहीं हैं। क्लास वर्क तो क्लास वर्क, ढेर होमवर्क तक दिया जा रहा। ऐसे में अभिभावक सुबह से दोपहर तक पहले क्लास वर्क करा रहे और दोपहर से शाम तक होमवर्क। इसलिए अभिभावकों की मुश्किल बढ़ गई है। 

फीस ली, तनख्वा नहीं दी

प्राइवेट स्कूल संचालकों की मनमानी का कोई सानी नहीं। जुगाड़बाजी कर फीस पर लगी रोक हटवा ली और सरकार के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए तीन माह की फीस वसूली भी शुरू कर दी, लेकिन शिक्षकों व कर्मचारियों को तनख्वा नहीं दे रहे हैं। सुनने में आया है कि बड़े-बड़े नामी गिरामी स्कूलों ने मार्च एवं अप्रैल का भी पूरा वेतन नहीं दिया और मई को लेकर तो अनिश्चितता बरकरार है। कहा जा रहा है कि छोटे कर्मचारियों को तो पहले ही साफ इंकार कर दिया गया है कि उन्हें अप्रैल और मई का वेतन नहीं मिलेगा। सवाल उठ रहा है कि फिर स्कूल संचालक अभिभावकों पर तीन माह की फीस वसूली का दबाव क्यों बना रहे हैं। स्कूल बंद पड़े हैं, बिजली व पानी हर चीज का खर्चा बच रहा। शिक्षकों को भी वेतन दिया तो वो भी पूरा नहीं। फिर तीन माह की फीस वसूली किसलिए कर रहे।

साहब क्या होगा हम सबका

स्कूल संचालकों का एक नया कारनामा और सुनने में आ रहा। वे अभिभावकों पर ट्रांसपोर्ट फीस देने का दबाव भी बना रहे हैं, जबकि स्कूल बंद होने से ट्रांसपोर्ट तो चल ही नहीं रहा। स्कूल ही नहीं इनमें बड़े-बड़े इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट संचालक भी शामिल हैं। इन्होंने अपने यहां बस और अन्य वाहन चलाने वाले चालकों को मार्च का आधा ही वेतन दिया था और अप्रैल के लिए साफ मना कर दिया था। दो रोज पूर्व ही एक स्कूल के बस चालक ने मुझे फोन किया व बताया कि 'सर, मैनेजर साहब ने मना कर दिया है कि अप्रैल व मई में कोई ड्यूटी नहीं कराई, इसलिए तनख्वा नहीं मिलेगी।' दस-बारह हजार महीना कमाने वाले ऐसे सैकड़ों बस चालक व परिचालक हैं, जो सिर्फ इस वेतन के जरिए ही मासिक गुजर-बसर करते हैं। ऐसे में वे पूछ रहे कि ऐसे में उनका क्या होगा, जब वेतन ही नहीं मिलेगा।

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नहीं पड़ी गर्मियों की छुट्टी

हमारी सरकार के कहने ही क्या। पब्लिक स्कूल संचालकों का दबाव इस कदर हावी है कि सरकार बच्चों के लिए ग्रीष्मकालीन अवकाश तक घोषित नहीं कर रही है। स्कूल संचालक इसलिए अवकाश घोषित नहीं कर रहे, ताकि अभिभावकों से किसी तरह फीस निकाल सकें। स्कूल संचालकों के दबाव में बैठी प्रदेश सरकार ने छोटे बच्चों की परवाह किए बगैर उच्च शिक्षा यानी युवाओं के लिए 25 जून तक ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित कर दिया। जबकि पहले यही सरकार 27 मई से स्कूलों में ग्रीष्मकालीन अवकाश करने का दंभ भर रही थी। सरकार की 'चादर' ओढ़े बैठे निजी स्कूल संचालकों का हाल तो यह है कि सरकार के आदेश भी तार-तार करने से बाज नहीं आ रहे। सरकार की ओर से उन्हें केवल एक माह की फीस लेने की छूट दी गई, लेकिन ऐसा कहीं नहीं हुआ। स्कूल वालों ने तो सीधे तीन माह की फीस मांगी और वसूल भी कर ली। 

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Posted By: Sunil Negi

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