देहरादून, [जेएनएन]: पूर्व हॉकी खिलाड़ी एवं ओलंपियन हरदयाल सिंह का 87 साल की उम्र में निधन हो गया। वह देहरादून में परिवार सहित रहते थे। वर्ष 1956 में मेलबोर्न ओलंपिक में उन्‍होंने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया था। 1972 से 1987 तक वह भारतीय हॉकी टीम के चीफ कोच भी रहे थे। उनके निधन से खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

मुफलिसी में दिन बीता रहे थे हरदयाल 

मेलबर्न ओलंपिक 1956 में स्वर्ण पदक विजेता और भारतीय हॉकी टीम के हीरो रहे हरदयाल सिंह मुफलिसी में जी रहे थे। उत्तराखंड सरकार ने उनकी सुध नहीं ली तो 2015 में पंजाब सरकार ने इस अनमोल हीरे की सुध ली और उनकी मदद को आगे हाथ बढ़ाया। देश को हॉकी में अविस्मरणीय जीत दिलवाने वाले सिंह को पंजाब सरकार ने दो लाख रुपये की आर्थिक मदद दी थी, तो उनकी दवाओं के खर्च का बिल भुगतान हुआ।

वर्ष 1956 के ओलंपिक में बलबीर सिंह सीनियर के घायल हो जाने के बाद मैदान पर उतरे हरदयाल सिंह ने उस मैच में पांच गोल दागकर भारतीय टीम को शानदार जीत दिलाई थी। अमेरिका की टीम को इस मैच में भारत ने 16-0 से रौंद डाला था। इस मैच के बाद हरदयाल सिंह अचानक सुर्खियों में आ गए थे। उन्होंने ओलंपिक खेलों में 19 गोल भारत के लिए किए हैं। इन दिनों हरदयाल सिंह देहरादून में बल्लीवाला चौक स्थित पुष्पा एनक्लेव में रह रहे थे।

बुढ़ापे में बीमारियों ने जकड़ा तो जमा पूंजी भी उपचार पर खर्च हो गई। देश का स्टार खिलाड़ी मुफलिसी में रहता रहा। वर्ष 2015 में उन्होंने मदद को उत्तराखंड सरकार व पंजाब सरकार से एक साथ गुहार लगाई। उत्तराखंड सरकार ने तो उन्हें मदद मुहैया कराने के लिए कोई कदम नहीं उठाए पर पंजाब सरकार ने पूर्व ओलंपियन की सुध ली थी। पंजाब के तत्कालीन उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने पूर्व ओलंपियन को दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। 

हरदयाल सिंह यहां अकेले रह रहे थे। उम्र के साथ शरीर साथ नहीं दे रहा था और दवाओं का खर्चा भी अधिक हो गया है। हॉकी में देश को गर्व का अहसास कराने वाले हरदयाल सिंह 1985 में एशिया कप खेलने गई भारतीय हॉकी टीम के मुख्य कोच रहे थे। सिख रेजीमेंट का हिस्सा रहे हरदयाल सिंह को 2004 में ध्यानचंद अवार्ड प्रदान किया गया था।

निधन पर जताया शोक

खेल मंत्री अरविन्द पाण्डेय ने उत्तराखंड के एक मात्र ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट हॉकी खिलाड़ी हरदयाल सिंह के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्हें सह्रदय विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्‍होंने बताया की भारतीय हॉकी जगत में उनका विशेष स्थान रहा है। उनका उस विजेता हॉकी टीम (1956), जिसने मेलबोर्न में भारत को ऐतिहासिक स्वर्ण दिलाया। हॉकी जगत में उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

आखिरी सांस तक हॉकी में जीते रहे हरदयाल

ओलंपियन हरदयाल सिंह पूरी जिंदगी हॉकी में ही जीते रहे। हॉकी में ही उनका दिल बसता था। हर समय में हॉकी के भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे। वह अंतिम समय तक यही कहते रहे कि हॉकी में वर्चस्व की जंग खिलाडिय़ों का भविष्य बर्बाद कर रही है। उनका कहना था कि जब से हॉकी इंडिया व इंडियन हॉकी फेडरेशन के बीच विवाद पैदा हुआ, तब से हॉकी का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। दोनों गुट अपना दबदबा कायम रखने के लिए खिलाडिय़ों का भविष्य खराब कर रहे हैं। जबकि, एक समय ऐसा था, जब भारतीय टीम ने हॉकी में बड़े उलटफेर किए। 

वे बार-बार यही कहते रहे कि अब नई पीढ़ी को हॉकी के लिए तैयार करने की जरूरत है। लेकिन, विडंबना है कि आज भी कई राज्यों में हॉकी एसोसिएशन अस्तित्व में ही नहीं है। उत्तराखंड में भी हॉकी की कोई एसोसिएशन नहीं है। उनकी तमन्ना थी कि वर्ष 2018 में होने वाले राष्ट्रीय खेलों की तैयारी में उत्तराखंड पूरे दमखम के साथ जाए। हालांकि, वे यह भी कहते थे कि एसोसिएशन के अस्तित्व में न होने के कारण यह काम थोड़ा मुश्किल जरूर है, लेकिन प्रदेश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। जरूरत है उसे तराशने की। यदि प्रदेश ने अपनी स्थिति सुधारी तो निश्चित रूप से उत्तराखंड की टीम राष्ट्रीय खेल में पदक जीत सकती है।

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Edited By: Sunil Negi