जागरण संवाददाता, देहरादून: नई आबकारी नीति में बार संचालकों को शराब ठेकों से शराब खरीदने की छूट को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। सवाल इसलिए भी स्वाभाविक हैं कि बारों को शराब खरीदने व उसके परिवहन का परमिट निरीक्षक नहीं, बल्कि शराब ठेकों के संचालक या सेल्समैन जारी करेंगे। ऐसे में शराब तस्करी व पैकारी (एक ठेके का माल दूसरे ठेके में खपाना) बढ़ने भी आशंका भी है।

अब तक यह व्यवस्था रही है कि बार संचालक एफएल-टू से शराब खरीदते हैं और इसके लिए संबंधित इंस्पेक्टर परमिट जारी करते हैं। नई नीति में इस व्यवस्था को बाईपास कर दिया गया है। बार संचालकों को ठेके से शराब खरीदने की छूट के साथ यह अनुमति भी दी गई है कि वह प्रदेश के किसी भी ठेके से माल खरीद सकते हैं। ऐसे में इस बात की आशंका भी बढ़ गई है कि बार संचालक व शराब ठेका संचालक मिलकर पैकारी या तस्करी भी करा सकते हैं। उदाहरण के लिए देहरादून के किसी बार संचालक ने हरिद्वार के किसी ठेके से माल लिया तो वह बड़ी आसानी से रास्ते में पड़ने वाले किसी भी स्थान पर शराब पहुंचा सकता है। दूसरी तरफ ठेका संचालक या सेल्समैन को परमिट जारी करने की अनुमति देने से वास्तविक आपूर्ति में मनमाफिक फेरबदल किया जा सकता है।

बार संचालकों में खलबली, लगाने लगे चक्कर

आबकारी नीति में शराब व बीयर बारों के लिए तीन साल की लाइसेंस फीस एकमुश्त अदा करने की व्यवस्था के बाद से बार संचालकों में खलबली की स्थिति है। कई बार संचालक अब जिला आबकारी अधिकारी कार्यालय के चक्कर लगाने लगे हैं। हालांकि, उन्हें दो टूक जवाब देकर बैरंग लौटा दिया जा रहा है। बार संचालकों का यह भी कहना है कि यदि तीन साल की लाइसेंस फीस (करीब नौ लाख रुपये) एकमुश्त वसूल की गई तो कई बार बंद होने के कगार पर आ जाएंगे। क्योंकि एफएल-टू से शराब खरीदने पर बार संचालकों को विभिन्न कंपनियों से ऑफर भी प्राप्त होते थे।

Posted By: Jagran

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