देहरादून, सुमन सेमवाल। कहां तो हमारा राज्य कोरोना संक्रमण के खात्मे की तरफ बढ़ रहा था और कहां अब जमातियों की हरकत ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। लॉकडाउन में पहले जमात में जाने की गुस्ताखी और फिर पुलिस और प्रशासन के साथ लुकाछिपी। जैसे-तैसे पकड़ में आए भी तो आशंका के अनुरूप हाल मिला। मामला, अब संक्रमण का कम और मंशा का अधिक नजर आ गया। बेशक ये दोष जमातियों का ही है, मगर संदेह की नजर से उनके करीबियों उनके आसपास रहने वाले लोगों को भी देखा जाने लगा है। हम इस बात के पक्षधर नहीं, मगर आपदा जैसे हालात में स्थितियां उतनी आदर्श भी तो नहीं रहती। यह समाज का सवाल है और हर व्यक्ति को इसका ख्याल रखना चाहिए। कम से कम ऐसे हालात पैदा मत करो कि आपसे जुड़े लोगों को इसका दंश झेलना पड़े। उत्तराखंड में कभी ऐसी नौबत नहीं आई। आगे भी न आने पाए।

ई गवर्नेंस का मतलब समझा

कहने को लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम होम चल रहा है। पर हकीकत में वर्क फ्री होम हो रखा है। अब अधिकारी कर्मचारी घर से काम करें भी तो कैसे और करें क्या? सालों से हम ई-गवर्नेंस का राग अलाप रहे हैं। इसके नाम पर कुछ कंप्यूटरों की संख्या तो बढ़ गई, सिस्टम नहीं बन पाया बस। ऑनलाइन सेवाओं का हाल क्या है, किसी से छिपा नहीं है। कोषागार के जिस इंटीग्रेटेड फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम को लागू ही इसलिए किया गया था कि अब बिल हाथ से लेकर नहीं आने हैं। इस लॉकडाउन में बिलों का क्या हुआ, किसी से छिपा नहीं है। कितने बिल पहुंच गए और कितने अटक गए, इसका भी अब तक हिसाब नहीं है। इस सिस्टम में तो काम और बढ़ गया है। पहले बिल अपलोड करो, फिर हाथों हाथ उसे लेकर भी जाओ। कोरोना में अब कम से कम ई-गवर्नेंस की अहमियत तो समझ आ रही है।

लॉकडाउन में शराब का सुरूर

लॉकडाउन में शराब की सुरूर। ये भला कैसे संभव है। अरे भाई शराब का मामला है तो सब कुछ संभव है। तब भी जब ठेके बंद चल रहे हैं और चप्पे-चप्पे पर पुलिस का पहरा भी है। फिर भी शराब की सप्लाई हो रही है। सभी लोगों तक नहीं, मगर उन तक जरूर जो थोड़ा ऊंचे दाम दे सकते हैं। दो से ढाई गुना दाम वसूल किए जा रहे हैं और लेने वाला भी हाथ जोड़कर मांग रहा है। सुना है शराब के कुछ ठेके सुबह तीन-चार बजे भी एक-दो घंटे के लिए खुल रहे हैं और खूब ऊंचे दाम पर शराब बेची जा रही है। अब शराब पर अंकुश लगे भी तो कैसे। जिस शराब और उसके राजस्व के लिए लॉकडाउन में ही दुकानों की लॉटरी करा दी, तो अब निगाहें फेरकर बिकवाने में क्या हर्ज है। यह बात और है कि तब राजस्व का सवाल था और अब?

यह भी पढ़ें: लॉक डाउन में सब तक पहुंचनी चाहिए ऑनलाइन शिक्षा, पढ़िए

आवश्यक के नाम पर अनावश्यक

लॉकडाउन में तो छूट मिली है आवश्यक सेवा के लिए, मगर उसकी आड़ में अनावश्यक सेवा भी चालू है। दिखाने को दो-चार अंडे की ट्रे रख दो, दूध-दही की ट्रे सजा दो। फिर चाहे उसकी आड़ में तंबाकू बेचो या कॉस्मेटिक का सामान। इसी आड़ में बेकरी की दुकानों की भी निकल पड़ी है। सामान की भी ऐसी कमी नहीं कि इस तरह की दुकानों को भी खोलने की अनुमति दे दी जाए। गनीमत है कि यहां कोरोना वायरस का उतना प्रकोप नहीं दिख रहा। जिन जमातियों ने सरकार का गणित बिगाड़ा था, उन्हें भी अलग से लॉक कर दिया है। वरना दून को भी न्यूयार्क बनते देर न लगती। वहां भी तो ऐसे भी तमाम स्टोर्स ने धड़ल्ले से कोरोना का दंश बांट दिया। अब भी हम नहीं कह सकते कि हालात कंट्रोल में हैं। मगर, आवश्यक के बीच चल रहे अनावश्यक पर कंट्रोल तो लगा ही सकते हैं।

यह भी पढ़ें: योजना का नाम बदलने के बाद सरकार ने नहीं ली इनकी सुध

Posted By: Sunil Negi

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस