उपभोक्ता आयोग का अहम फैसला, पोस्टमार्टम नहीं हुआ तो भी बीमा दावा खारिज नहीं कर सकती कंपनी
आकस्मिक मृत्यु के मामलों में यदि मृत्यु का कारण अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित हो तो पोस्टमार्टम अनिवार्य नहीं है।

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जागरण संवाददाता, देहरादून। आकस्मिक मृत्यु के हर मामले में पोस्टमार्टम अनिवार्य नहीं है। यदि मृत्यु का कारण अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित हो रहा है तो केवल पोस्टमार्टम नहीं होने के आधार पर बीमा कंपनी दावा खारिज नहीं कर सकती।
सांप के डसने से किसान की मौत के मामले में राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए बीमा कंपनी को तीन लाख रुपये की बीमा राशि छह प्रतिशत ब्याज समेत देने का आदेश बरकरार रखा है।
सांप के डसने से हो गई थी मौत
मामला हरिद्वार जिले के लक्सर क्षेत्र का है। किसान शाहिद सहकारी गन्ना विकास समिति लिमिटेड, लक्सर के सदस्य थे और समूह व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना के तहत तीन लाख रुपये से बीमित थे। दो अगस्त 2020 को खेत में खाद डालते समय सांप के डसने से उनकी मौत हो गई।
परिजनों ने बीमा राशि के लिए दावा किया, लेकिन नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड ने पोस्टमार्टम नहीं होने और अंतिम संस्कार के बाद पुलिस को सूचना नहीं दिए जाने का हवाला देकर दावा खारिज कर दिया। जिस पर उनके पुत्र कुरबान अली ने जिला उपभोक्ता आयोग, हरिद्वार में शिकायत दाखिल की। जिला आयोग ने बीमा कंपनी को तीन लाख रुपये की बीमा राशि, ब्याज और अन्य राशि देने का आदेश दिया। कंपनी ने इसके खिलाफ राज्य आयोग में अपील की।
राज्य आयोग की अध्यक्ष कुमकुम रानी और सदस्य बीएस मनराल ने मामले में पाया कि बीमा कंपनी के अपने जांचकर्ता और गांव के प्रधान ने भी किसान की मौत सांप के डसने से होने की पुष्टि की थी।
आयोग ने माना कि जब मृत्यु का कारण विश्वसनीय साक्ष्यों से स्थापित हो चुका हो और किसी आपराधिक घटना की आशंका न हो तो पोस्टमार्टम नहीं होने को बीमा दावा खारिज करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। आयोग ने यह भी माना कि मृतक के अन्य कानूनी वारिसों ने शपथपत्र देकर बीमा राशि कुरबान अली को दिए जाने पर अनापत्ति जताई थी। इसलिए उनकी शिकायत सुनवाई योग्य थी।
हालांकि आयोग ने जिला आयोग की ओर से दिए गए अतिरिक्त पांच हजार रुपये मुआवजे को हटा दिया। उसका कहना था कि बीमा राशि पर ब्याज दिए जाने के कारण अलग से मुआवजा देना उचित नहीं है। बाकी आदेश बरकरार रखते हुए कंपनी को तीन लाख रुपये बीमा राशि, छह प्रतिशत ब्याज और पांच हजार रुपये वाद व्यय देने का निर्देश दिया गया।
