राज्य ब्यूरो, देहरादून: राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को प्रदेश में जरूरत के हिसाब से मल-जल उपचार संयंत्र (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) स्थापित करने के लिए व्यापक व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं।

प्राधिकरण ने मुख्य सचिव को उस शिकायत का संज्ञान लेने को भी कहा है, जिसमें कहा गया है कि ऋषिकेश में नगर निगम के कर्मचारी शौचालय परिसर के बाहर स्नान करने के साथ ही वाहनों को धो रहे हैं। यह पानी बिना उपचार के सीधे गंगा में जा रहा है।

बुधवार को एनजीटी के अध्यक्ष जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्त्‍ता विपिन नैय्यर की याचिका पर सुनवाई की।

याचिका में एनजीटी के तीन जनवरी के उस आदेश का अनुपालन कराने की अपेक्षा की गई है, जिसमें एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे कि गंगा में बिना उपचार के गंदा पानी न मिलने दिया जाए।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि ऋषिकेश नगर निगम अवैध तरीके से मैदानी बाढ़ क्षेत्र में शौचालयों का निर्माण कर रहा है। यहां से भी बिना उपचार के ही पानी गंगा में प्रवाहित किया जा रहा है। पानी के उपचार के लिए कोई सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट भी नहीं लगाया गया है।

इस पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने कहा कि गंगा किनारे के सभी गांव और कस्बों को शौचालयों के संबंध में पूर्व में जारी मानकों का अनुपालन करना जरूरी है। सेप्टिक टैंक से निकलने वाले अपशिष्ट को पूर्व से चिह्नित सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए। जब तक यह व्यवस्था नहीं बनती, तब तक वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाए। सेप्टिक टैंक नियमित रूप से साफ किए जाएं। यह सुनिश्चित किया जाए कि बिना उपचारित अपशिष्ट गंगा में न जाए।

एनजीटी पूर्व में भी यह सुनिश्चित करने के निर्देश दे चुका है कि बिना उपचार के गंदा पानी गंगा में न गिराने के लिए निकाय स्तर पर निगरानी समिति गठित करने के साथ ही जन जागरूकता अभियान चलाया जाए।

Edited By: Sunil Negi