देहरादून, जेएनएन। देहरादून नगर निगम चुनाव में महापौर पद पर बंपर वोटों से जीतकर आए सुनील उनियाल गामा का सफर चुनौतियों से भरा होगा। दून के नए महापौर के रूप में गामा पर एक-तरफ पुराने शहर के विकास का दारोमदार रहेगा, तो दूसरी तरफ जो हिस्सा गांव से अलग होकर निगम से जुड़ा है, उसके विकास की शुरुआत उन्हें शून्य से करनी होगी। क्योंकि यह भाग शहर का रूप तो ले चुका है, मगर शहर के अनुरूप यहां सुविधाओं का अभाव है।

गामा के लिए यह चुनौतियां इसलिए भी बड़ी हैं, क्योंकि महापौर के रूप में उनका यह पहला अनुभव है। इससे पहले भी उन्होंने संस्थागत रूप से किसी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया है। उनके लिए सिर्फ राहत की इतनी बात जरूर है कि नगर निगम के नए बोर्ड में भाजपा पार्षदों का दबदबा रहेगा और किसी भी प्रस्ताव को बिना अड़चन पास किया जा सकेगा। 

हालांकि प्रस्ताव के चरण तक पहुंचने के लिए निकट भविष्य के महापौर सुनील उनियाल गामा को न सिर्फ निगम की प्रशासनिक व्यवस्था को जल्द आत्मसात करना होगा, बल्कि उसका बखूबी प्रयोग करने में भी दक्षता हासिल करनी होगी। 

वर्तमान शहर (पुराने वार्ड) में जहां केंद्र सरकार की तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं, वहीं नए जुड़े वार्डों तक भी उनका विस्तार करना जरूरी है। इस तरह से इस निकाय चुनाव में नए वार्डों से गामा को बड़ी संख्या में वोट मिले हैं, उसे देखते हुए वह अपना खास फोकस भी ऐसे इलाकों में करना चाहेंगे। 

हालांकि निगम एक स्ववित्तपोषित संस्था है, लिहाजा अधिकतर कार्यों के लिए निगम को अपने संसाधनों पर निर्भर रहना होगा। यह तभी संभव है, जब निगम अपनी आय के स्रोत में भी इजाफा कर पाएगा।

नए वार्डों में संसाधनों का विकास

दून से सटे ग्रामीण इलाकों से 32 नए वार्ड बनाए गए हैं। शहर के करीब होने के कारण यहां आलीशन आवासीय भवन व व्यापारिक प्रतिष्ठान खड़े हो चुके हैं, लेकिन गांव का हिस्सा होने के चलते सुविधाओं का अभाव है। कूड़ा उठान से लेकर जल निकासी के इंतजाम तक इन क्षेत्रों अभी भगवान भरोसे है। 

इसके अलावा सीवरेज व्यवस्था के नाम पर भी यहां कुछ नहीं है। यह ऐसे कार्य हैं, जिसे अपने संसाधनों पर कराना निगम के बूते से बाहर की बात है। ऐसे में गामा को एक कुशल महापौर की तरह केंद्र व राज्य सरकार के स्तर पर योजनाओं को स्वीकृत कराने के प्रयास करने होंगे।

कूड़ा प्रबंधन के इंतजाम बौने

वर्तमान में शहर से रोजाना करीब 290 टन कूड़ा निकलता है, जबकि उठान सिर्फ 200 टन के आसपास ही हो पाता है। डोर-टू-डोर कलेक्शन की योजना आज तक दून में प्रभावी रूप से लागू ही नहीं हो पाई है। इसके अलावा कूड़े को स्रोत के स्तर पर जैविक-अजैविक रूप से पृथक करने की संस्कृति भी दून में विकसित नहीं हो पाई है। जब तक कूड़ा प्रबंधन को बेहतर नहीं बना दिया जाता, तब तक सुंदर दून का सपना साकार कर पाना असंभव है।

स्मार्ट सिटी परियोजना

करीब डेढ़ साल पहले दून का चयन स्मार्ट सिटी परियोजना में कर लिया गया था और अब तक धरातल पर कुछ भी काम नहीं किए जा सके हैं। जबकि, देहरादून स्मार्ट सिटी कंपनी में महापौर के पास अहम जिम्मेदारी है और इसके तहत दून के कोर एरिया का स्मार्ट तरीके से विकास किया जाना है।

निगम की भूमि पर कब्जे, जनहित में उपयोग नहीं 

शहर के प्रमुख इलाकों में नगर निगम की संपत्तियां या तो बेकार पड़ी हैं या फिर उन पर कब्जे कर लिए गए हैं। गंभीर यह कि अपनी संपत्तियों पर से कब्जे छुड़ाने के लिए निगम प्रशासन कभी गंभीर भी नहीं रहा। एक टाउन हाल को छोड़कर नगर निगम का कोई ऐसा स्थान या भवन नहीं है, जहां सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सके। 

शहर के करीब सभी क्षेत्रों में नगर निगम की संपत्ति मौजूद हैं। निगम ने जो व्यावसायिक संपत्तियां तैयार भी की हैं, वह भी बेहाल हैं। दूसरी तरफ निगम की कुछ भूमि पर सार्वजनिक पार्किंग स्थल भी लंबे समय से प्रस्तावित हैं, मगर उनका विकास नहीं किया जा रहा।

रिस्पना-बिंदाल का पुनर्जीवन चुनौती

वैसे तो रिस्पना नदी के पुनर्जीवीकरण को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने फ्लैगशिप प्रोग्राम के तहत रखा है, लेकिन यह काम नगर निगम की सक्रियता के बिना संभव नहीं है। क्योंकि अभी भी बड़े पैमाने पर कूड़ा नदियों में फेंक दिया जाता है और विभिन्न स्थानों पर घरों से निकलने वाले गंदे पानी और सीवर को भी यहीं उड़ेल दिया जाता है। पूर्व में नगर निगम ने रिस्पना व बिंदाल नदी को गंदगी मुक्त करने के लिए अभियान भी चलाए थे, हालांकि यह सिर्फ रस्म अदायगी तक सीमित रहे।

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Posted By: Bhanu

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